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अनंत चतुर्दशी रविवार 23 सितंबर, मंगलवार 25 से महालया प्रारम्भ: पं. प्रसाद दीक्षित

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पं. प्रसाद दीक्षित
धर्म-कर्म एवं ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ
काशी विश्वनाथ मन्दिर न्यासी।
– अनंत चतुर्दशी का व्रत, पूजन विधि व कथा
वाराणसी। भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी कहते हैं। इस दिन अनंत भगवान की पूजा की जाती है तथा अलोना (नमक रहित) व्रत रखा जाता है। इसमें उदयव्यापिनी तिथि ली जाती है। चतुर्दशी तिथि शनिवार रात्रि 4.56 से प्रारंभ होकर रविवार 23 सितंबर को दिन रात रहेगा तथा सोमवार 24 सितंबर को 6.32 सुबह तक चतुर्दशी तिथि रहेगी।

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इसके बाद पूर्णिमा तिथि लग जाएगी जो मंगलवार 25 सितंबर को प्रातः 7.41 तक रहेगी। पूर्णिमा का महत्व मंगलवार को प्रातः 7.41 तक रहेगां इस काल के अंतर्गत ही सभी धार्मिक कार्य पूर्णिमा के निमित्त होंगे। इसके बाद महालया प्रारंभ हो जाएगा। पूर्णिमा का योग होने से इसका फल और बढ़ जाता है। व्रती को चाहिए कि नैवेद्य लेकर किसी पवित्र नदी या सरोवर तट पर जाए और वहां स्नान के बाद व्रत के लिए संकल्प करें। संकल्प कर यथासंभव नदी तट पर भूमि को गोबर से लीप कर वहां कलश स्थापित कर उसकी पूजा करें। तत्पश्चात कलश पर श्री भगवान विष्णु की मूर्ति रखें तथा मूर्ति के सम्मुख 14 ग्रंथि युक्त अनंत सूत्र (डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनंताय नमः इस नाम मंत्र से भगवान विष्णु सहित अनंत सूत्र का षोडशोपचार पूजन पूजन करें। इसके बाद उस पूजित सूत्र को मंत्र पढ़कर पुरुष दाहिने हाथ में और स्त्रियां बाएं हाथ में बांध ले। अनंत सूत्र बांधने के अनंतर ब्राह्मण को नैवेद्य देकर स्वयं ग्रहण करना चाहिए तथा भगवान नारायण का ध्यान करते हुए घर जाना चाहिए। पूजा के अनंतर परिवारजनों के साथ इस व्रत की कथा सुननी चाहिये।

कथा- प्राचीन काल में सुमंतु नाम के वशिष्ठ गोत्रीय मुनि थे। उनकी पुत्री का नाम शीला था। पुत्री यथा नाम तथा गुण अर्थात अत्यंत सुशील थी। सुमंतु ने उसका विवाह कौंडिन्यमुनि के साथ किया था। शीला ने भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत भगवान का व्रत किया और अनंत सूत्र को अपने बाएं हाथ में बांध दिया। भगवान अनंत की कृपा से शीला के घर में सभी प्रकार की सुख समृद्धि आ गई और उनका जीवन सुखमय हो गया। दुर्भाग्यवश एक दिन मुनि ने क्रोध में आकर शीला के हाथ में बंधे हुए अनंत सूत्र को तोड़कर आग में फेंक दिया। इससे उनकी सब धन संपत्ति नष्ट हो गयी तथा वे बहुत दुखी रहने लगे। एक दिन अत्यंत दुखी होकर कौंडिन्यमुनि वन में चले गए और वहां वृक्षों, लताओं, जीव-जंतुओं सबसे अनंत भगवान का पता पूछने लगे। दयानिधान भगवान अनंत ने वृद्ध ब्राह्मण के रूप में कौंडिन्यमुनि को दर्शन दिया और उनसे अनंत व्रत करने को कहा। शीला और कौंडिन्यमुनि दोनों ने अनंत व्रत को किया और सुख समृद्धि पूर्वक रहने लगे।

 

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