आखिर क्या दोष था उसका ??

नित्या जायसवाल
आखिर क्या दोष था उसका?? वो विधवा, परित्यक्ता, या अविवाहित थी ???यही दोष था ना…
सदियों से हम सुनते आ रहे है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे के बिना अधूरे है।
ये सच है कि दोनों का काम एक दूसरे के बिना नहीं चल सकता।कई काम पुरुषों के बिना और कई स्त्रियों के बिना संभव नही होते।
ऐसे में इन महिलाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पुरुष का साथ जरूरी है।
ये जरूरत शारीरिक नही होती और हो भी सकती है ये प्रकृति पर निर्भर है स्त्री पुरुष की।
ऐसा नहीं कि इनकी जिन्दगी में इनको कोई दोस्त नही मिलता,मिलता है पर वो कब तक इनका साथ देता है??
उसकी खुद की पारिवारिक मजबूरियों के बीच वो इस रिश्ते को तवज्जो नही दे पाता। चाहकर भी वो उसको वो दर्जा नही दे सकता जो पत्नी को दिया है,भले ही पत्नी से ना बनती हो पर उसको छोड़ने का ख्याल दिल मे नही लाएगा,दूसरी तरफ वो औरत जो उसे अपना सब कुछ मान लेती है,उस की छोटी सी भूल पर भी वो उसको मनाने की जगह लापरवाही दिखाता है।आखिर क्यों???फर्क यही है कि पत्नी को समाज के सामने स्वीकार करके लाया है उस को छोड़ने के लिए कानूनी कार्यवाही करनी होगी।
दूसरी तरफ वो औरत जिसका उसके सिवा कोई नहीं उसे बिना किसी कानूनी दांव पेंच के छोड़ा जा सकता है।
अपने घर कितना ही लेट हो जाएगा पर जाएगा जरूर… नही जा सकता तो फोन से सूचित करेगा, पर वो औरत कितनी बार बाट देखती सो जाती है आना तो दूर,फोन भी जरूरी नही समझता।
मैं सोचती हूं कि कसूर उसका इतना ही है ना कि उसको जीवन मे एक ऐसे शख्स की जरूरत है जो उसका दर्द बांटें,मुसीबत में मदद करे,इस के पीछे वो बदनामी मोल लेती है,अपनी अंतर आत्मा का गला घोंटती है।जो घर वाले उसको बुरा भला कहते है,वो क्यों नही उसके लिए जीवन साथी तलाशते???क्यों छोड़ देते है उसे उन बच्चों के सहारे जो अपना परिवार बनने के बाद उस को भूल जाते है!!
मैं पूछती हूं कहाँ जाएंगी वो औरतें!!
समाज की नजर में ष्बुरी औरतष्का खिताब लेकर ये भी जीती है पर ये जानबूझकर ऐसी नही बनी !!
इनकी मजबूरियों ने इनको ऐसा बनाया है,घर पर पति के सानिध्य में रहने वाली औरतें नही जान सकती क्यो की उनके सब काम पूरे होते है बिना कठिनाई के ,कभी एकल महिला से पूछो कि कैसे जिया जाता है अकेले,सब की गिद्ध दृष्टि उसी पर रहती है,हर एक सोचता है कि इसको शारीरिक भूख होगी पर ये उतनी महत्वपूर्ण नही जितनी दैनिक जीवन की परेशानियां है।
इनको बुरा कहने वाली महिलाओं को पता होगा कि इन महिलाओं को बुरा बनाने वाला इंसान उनमे से ही किसी का पति है।
जो इनकी लाचारी का फायदा उठा रहा है।
कभी उन की जगह खुद को रखकर सोचें।
और उन तमाम अभिभावकों से कहूंगी कि ऐसी स्थिति में अपनी बेटी या बहु को कभी अकेला न छोड़े उसको साथी दिलाएं।ऐसा साथी जो जब वो इंतजार करे तो घर आये,ऐसा साथी जो समाज के सामने उसे अपने साथ लेकर जा सके ऐसा साथी जो उसकी जिम्मेदारी निभा सके।
यदि ऐसा होता है तो दो घर सुधर जाएंगे।
और उन महिलाओं से भी कहूंगी इस मृग तृष्णा के पीछे ना भागे सिवाय दुखों के कुछ हासिल नही होगा,अपने से भी नफरत हो जाएगी।कोई स्थायी साथ ढूंढें।

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