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इलाहाबाद: अधिकतर सीटों पर त्रिकोणीय लडाई की स्थिति, 23 को मतदान

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विजय श्रीवास्तव
-भाजपा को खाता खोलने की चुनौती
-सपा व बसपा के सामने अपने सीटों को बरकरार रखने की चुनौती
-बागी उम्मीदवार व भीतरघात से हर पार्टी है परेशान
इलाहाबाद। विगत 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 10 में से 7 सीटों पर कब्जा किया था। इस बार सबसे बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी के लिए अपनी उन सीटों पर कब्जे को बरकरार करना होगा। इस बार उसके साथ कांगे्रस भी गठबंधन कर चुनाव लड़ रही है लेकिन कुछ सीटों पर सपा के उम्मीदवार खड़ा करने बावजूद कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार को खड़ा कर दिया था। वैसे बाद में उम्मीदवारी वापस ले ली लेकिन बागी तेवर के चलते इससे सपा को नुकसान पहुचने की संभावना है। इलाहाबाद के अधिकतर सीटों पर त्रिकोणीय लडाई की स्थिति बनते दिख रही है। कुछ सीटों पर बागी उम्मीदवारों से भी फर्क पड़ने के आसार है।
इलाहाबाद में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती खाता खोलने की है। पिछले बार चुनाव में भाजपा का खाता भी नहीं खुल पाया था। वैसे इलाहाबाद दक्षिणी व बारा सीट पर भाजपा कड़ी टक्कर देते दिख रही है। इसके साथ ही एक सीट पर अपना दल के उम्मीदवार के मजबूती से लड़ने की स्थिति में भी भाजपा को फायदा होते नजर आ  रहा है। वहीं बसपा जो पिछले विधानसभा चुनाव में दो सीट जीत दर्ज की थी। उसे बरकरार रखते हुए कुछ सीटों का इजाफा करने की चुनौती होगी।
  विधानसभा सीट पर एक नजर                     
 इलाहाबाद पश्चिमी –
इस सीट काफी चर्चित सीट है। बसपा की पूजा पाल इस सीट पर विगत दो बार से विधायक हैं। उनके पति राजू पाल ने इसी सीट पर बाहुबली नेता अतीक अहमद को हरा कर इस सीट पर कब्जा किया था। उसके बाद उनकी हत्या के बाद से लगातार उसकी पत्नी पूजा पाल जीत रही हैं। पाल व मुस्लिम वोट अगर उनको मिलते है तो इस बार भी उनकी स्थिति मजबूती दिखती है। इस सीट से सपा गठबंधन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्ष ऋचा सिंह को उतार कर युवाओं को आकर्षित करने के साथ स्वर्ण व अपने पारम्परिक वोट बैंक व कांग्रेस के वोट से संघर्ष की स्थिति में है। वहीं भाजपा भी इस बार पार्टी के बड़े चेहरे सि़द्धार्थ नाथ सिंह को उतारा है, वह राष्टीय सचिव होने के साथ पश्चिम बंगाल व आंन्ध्र प्रदेश के प्रभारी भी है लेकिन चुनाव में उतरने के बात है तो वह पहली बार उतरे है। इस सीट पर त्रिकोणीय लडाई की स्थिति बनती दिख रही है।
2: इलाहाबाद दक्षिणी –
इस सीट से इस बार भाजपा से नन्द गोपाल नंदी को उतरा है। वर्ष 2012 में कांग्रेस से चुनाव लड़े लेकिन हार गये इस बार भाजपा में भाग्य आजमा रहे है। नंदी को टिकट मिलने से भाजपा के पदुम जायसवाल जो टिकट की आस में लगे थे, ने पार्टी से बगावत कर पार्टी छोड़ कर सपा का दामन थाम दिया है। इससे भाजपा में नंदी को लेकर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वैसे बड़े कारोबारी होने के नाते उन्हें अगर बनिया व भाजपा का वोट मिलता है तो लड़ाई में दिखते हैं। नंदी वैसे 2007 में बसपा से जीत कर मंत्री तक रहे चुके हैं। सपा यहां से पुनः अपने वर्तमान विधायक हाजी परवेज को उतारी है। उन्हें भी मुस्लिम व गठबंधन का लाभ अगर मिलता है तो वह भी संघर्ष की स्थिति में हेै। इसके साथ ही बसपा ने मसुक खान को मैदान में उतारा है। वे अगर मुस्लिम वोट व दलितो ंके वोट को संगठित करने में सफल रहे तो त्रिकोणीय लड़ाई का हिस्सा बन सकते हैं।
3: इलाहाबाद उत्तरी –  
यह सीट भी विगत चार बार से कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह जीतते आ रहे है। अपने स्वभाव, लोकप्रियता के वजह से इस बार भी उनकी स्थिति काफी मजबूत दिख रही है। इस बार उन्हें गठंबधन के चलते और फायदा मिलने के आसार है।  बसपा ने इस सीट से कायस्थ चेहरा अमित श्रीवास्तव को उतरा है। मुम्बई में फिल्म प्रोडक्शन के कार्य से जुड़े अमित अपना भाग्य आजमा रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा ने इस सीट हर्षबर्धन बाजपेयी को उतारा है। विरासत में उन्हें राजनीति मिली है।  उनके पिता अशोक बाजपेयी  विधायक रहे चुके हैं जबकि उनकी माता सपा की नेता रह चुकी है। अगर पारिवारिक सम्बधों के साथ भाजपा को वोट ठीक ठाक मिला तो संघर्ष की स्थिति बन सकती है।
4: फाफामऊ –  
इस सीट पर पिछले बार समाजवादी पार्टी के अंसार अहमद चुनाव जीते। पहली बार वह अपना दल से चुनाव जीत चुके है। काफी चर्चित शख्सियत हैं। गठबंधन का फायदा व अपने मुस्लिम और सपा के वोट बेैंक को बरकरार रखने में सफल हुए तो मुख्य लड़ाई में अपना स्थान बनाते दिखते हैं। बीजेपी से ताल ठोक रहे विक्रमाजीत मौर्य 1991 मे जनता दल के बैनर तले विधायक बने। उसके बाद 1996 में कांगेस से जीत हासिल की। बाद में दल बदल कर भाजपा का समर्थन कर उर्जा मंत्री तक बने। इस बार उनके लिए यह क्षेत्र नया है लेकिन कई पार्टियों के नब्ज को टटोलने में माहिर मौर्य मजबूती से लडेंगे। वहीं बसपा से मनोज पांडेय भाग्य आजमा रहे हैं। पहली बार निर्दल चुनाव लड़े थे लेकिन हार गये थे। कारोबारी मनोज अगर अपने ब्राहमण वोट बंैक के साथ बसपा के पारम्परिक वोट मुस्लिम व दलित को बटोरने में सफल होते हैं तो वह त्रिकोणीय लड़ाई में आ सकते हैं।
5: हंडिया  –
इस सीट पर भाजपा-अपना दल गठबंधन की तरफ से अपना दल ने प्रमिलाधर त्रिपाठी मैदान में उतारा है।उनके पति राकेश धर त्रिपाठी कई बार विधायक व कैबिनेट मंत्री रह चुके है। वैसे यह बात दिगर है राकेश धर बसपा से चुनाव जीतते रहे है लेकिन इस बार उनकी पत्नी अपना दल से भाग्य आजमा रही है। वहीं सपा ने एमएलसी व पूर्व शिक्षाधिकारी वासुदेव यादव की बेटी निधि यादव को मैदान में उतारा है। वे सपा सरकार की तरफ से चुनाव के गुर सीखने के लिए अमेरिका भी जा चुकी हैं। पिछले बार भी इस सीट से सपा प्रत्याशी ने 88, 475 वोट पाकर जबरस्त जीत हासिल की थी। अब देखना है कि इस चुनाव में किस टेकनिक से का प्रयोग करती हैं। वैसे युवा चेहरा होने के नाते अच्छी लड़ाई में हैं। बसपा की तरफ से पार्टी ने हाकिम लाल बिन्द को उतरा है। नया चेहरा व एक गावं के प्रधान के साथ फर्नीचर के बड़े व्यवसायी हैं। अगर पार्टी के मुस्लिम वोट व दलित वोट मिलते है तो वह त्रिकोणीय लडाई का हिस्सा बन सकते हैं।
6: फूलपुर-  
इस सीट पर दो बार से समाजवादी पार्टी अपना परचम लहराती आ रही है। वैसे इस बार सपा ने अपने वर्तमान विधायक को टिकट न देकर मंसूर आलम को टिकट दिया है। पेशे से वकील मंसूर आलम फूलपुर के चेयरमेन रहे है। विधानसभा चुनाव में पहली बार भाग्य आजमाने वाले मंसूर अगर मुस्लिम वोट को समेटने में सफल रहे और उन्हें सपा व कांग्रेस के पारम्परिक वोट मिल गये तो उनकी स्थिति मजबूत दिखती है। भाजपा से भाग्य आजमा रहे प्रवीण पटेल पिछली बार इस सीट से बसपा के बैनर तले चुनाव मैदान में थे। लेकिन चुनाव हार गये थे वैसे वह बसपा के टिकट पर 2007 में चुनाव जीत चुके हैं। इस बार बीजेपी से लड़ने वाले प्रवीण को अगर पिछ़डी जाति व बीजेपी के वोट बैंक को हासिल करने में सफल रहे तो मजबूती से लड़ने की स्थिति में हैं। इस सीट से बसपा ने नया चेहरा के नाम पर मो. मसरूर शेख को मैदान में उतारा है। शेख पहली बार चुनाव लड़ रहे है। कारोबारी शेख मुस्लिम वोट व दलित में अपनी पैठ बनाने में सफल होते हैं तो लडाई में आ सकते हैं।
7: प्रतापपुर-   
इस सीट से सपा ने विजया यादव ने को मैदान में उतारा है। विजया यादव तीन बार से विधायक रह चुकी है। वह पूर्व विधायक जवाहर सिंह की पत्नी है। एक लोकप्रिय नेता की छवि के चलते मुख्य लड़ाई में हैं। इसके साथ ही कांग्रेस से गठबंधन का भी उन्हंे सीधा लाभ मिलेगा। बीएसपी से लड़ रहे हाजी मुज्जबा सिद्की भी दमदार प्रत्याशी हैं हाजी भी 2002 व 2007 में विधायक रह चुके है। वह भी साफ सुथरी छवि के लिए जाने जाते हैं। अगर मुस्लिमों व दलित वोट को एकत्र करने में सफल हो गये तो बाजी पलटने में सफल हो सकते है। भाजपा व अपना दल ने गठबंधन के चलते अपना दल ने करन सिंह को  उतरा है। मुंबई में उनका अपना डिस्टलरी है। राजनीति में पहला प्रयास है। अगर भाजपा व अपना दल के मतदाताओं का पूर्ण समर्थन मिलता हैं तो त्रिकोणीय लड़ाई में आ सकते हेैं।
8: कोरांव –  
इस सीट पर रामबली जैसल बसपा से चुनाव लड़ रहे हैं। एक बार बसपा से मेजा विधानसभा सीट से जीत चुके हैं जबकि उसके बाद कोरांव से चुनाव जीते थे, इस बार फिर चुनाव मैदान मेंै हैं। मजदूर संगठनों में अच्छी धमक होने के चलते मौजूदा स्थिति में भारी है। जबकि वहीं भाजपा से राजमणि कोल चुनाव लड़ रहे हैं। पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण मतदातों को विश्वास में लेने में सफल हुए और भाजपा व अपना दल के मतदाताओं को भी उनपर विश्वास जमा तो अच्छी लड़ाई में आ सकते हैं। वहीं सपा कांग्रेस गठबंधन की स्थिति यहां विषम हो गयी है। रामकृपाल ने जहां कांग्रेस से ताल ठोक दी हैं वहीं सपा से रामदेव निडर ने पर्चा भर दिया है। जबकि यह सीट गठबंधन के चलते कांग्रेस को मिलना था। रामदेव का कहना है कि देर हो जाने से वे पर्चा वापस नहीं कर सके। जबकि वे पार्टी के हर फैसले का नतमस्तक हो कर स्वीकार करने  की बात भी कहते है।
9: सोरांव-
यह सीट इस समय भाजपा-अपना दल गठबंधन के लिए परेशानी का सबब बन चुकी है। इस सीट पर पहले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के करीबी माने जाने वाले सुरेन्द्र चैधरी का टिकट दिया गया लेकिन बटवारें के तहत यह सीट अपना दल के खाता में चली गयी। जिससे वहां से अपना दल के जमुना सरोज को टिकट दे दिया गया। इससे भाजपा के कार्यकर्ता नाराज है। बीएसपी नेे इस सीट पर गीता देवी को उतारा है। वह दूसरी बार चुनाव लड़ रही है। गीता देवी महिला वोट बैंक के साथ मुस्लिम व दलित वोटों को रिझाने में सफल रही तो वह संघर्ष की स्थिति में आ सकती है। इस सीट पर सपा-कांग्रेस गठंबठन से सपा ने अपने वर्तमान विधायक सत्यवीर मुन्ना पर दांव खेला है। वे पूर्व गृहमंत्री धर्मवीर भारती के पुत्र व शिक्षक के साथ लोकप्रिय होने के कारण लड़ाई में हैं।
10: बारा –
बारा सीट पर भी दिलचस्प लड़ाई है। इस सीट पर सपा के वर्तमान विधायक डाॅ अजय कुमार आज भाजपा के मैदान में बैटिंग कर रहे हैं। पाला बदल कर उन्होंने टिकट भी हासिल करने में सफलता प्राप्त कर ली। इसको लेकर पार्टी में थोड़ी विरोध जरूर है। अनुमान है उन्हें भाजपा व अपना दल का अगर ग्राउन्ड लेबल पर समर्थन मिला तो लडाई में दिख रहे हैं। बसपा ने अपने जिलाध्यक्ष अशोक गौतम को ही मैदान में उतार दिया है। वैसे पिछले चार चुनावों की बात की जाये तो बसपा यहां दूसरे नम्बर पर आ रही है। ऐसे में अगर दलित व मुस्लिम वोट को एकजुट करने में सफल रहे तो जीत की दौड़ में शामिल हो सकते हैं। यहां से कांग्रेस ने सुरेश वर्मा को मैदान में उतारा है। उनका यह पहला चुनाव है। जबकि यहंी से सपा ने अजय भारती मुन्ना को अपना उम्मीदवार भी खड़ा कर दिया है। वे पूर्व सांसद अमृत लाल भारती के बेटे है। गठबंधन होने के बावजूद दोंनो पार्टियों से प्रत्याशी खड़े होने के कारण गठबंधन को नुकसान पहचने की संभावना बन रही है।
11: मेजा –
इस सीट पर भी काफी रोचक लड़ाई देखने को मिल रही है। सपा ने इस बार तीन बार बसपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले रामसेवक को अपना उम्मीदवार खड़ा किया है। टिकट न मिलने पर बसपा छोड़ कर आये सपा में आये रामसेवक को सपा ने हाथो हाथ लेकर टिकट पकड़ा दिया। अगर सपा में कोई बगावत की स्थिति नहीं बनती और गठबंधन धर्म का सपा व कांग्रेस के मतदाताओं ने सम्मान किया तो रामसेवक आगे दिखते हेैं। भाजपा ने यहां से नीलम करवरिया को मैदान में उतरा है। नीलम पूर्व विधायक उदयभान करवरिया की पत्नी है। अगर अपना दल ने भी साथ दिया तो वह भी फाइट में हैं। इसके साथ यहां से बसपा ने एस के मिश्रा को चुनाव में उतारा है, इसके पहले वे निर्दल  चुनाव लड़े थे लेकिन हार गये थे। बसपा ने इस सीट से ब्राहमण उम्मीदवार को खड़ा कर स्वर्ण मतदाताओं को भी रिझाने की कोशिश की है लेकिन अभी त्रिकोणीय लड़ाई में है।
12: करछना –  
इस सीट से सपा ने राज्यसभा सांसद कुवंर रेवती रमण सिंह के बेटे उज्ज्वल रमण सिंह को मैदान में उतारा है। वैसे पिछले बार वे चुनाव हार गये थे लेकिन इस बार सपा व कांग्रेस गठबंधन के चलते स्थिति उनकी मजबूत होते दिख रही है। जबकि वहीं बीएसपी ने अपने वर्तमान विधायक दीपक पटेल को ही टिकट दिया है। मृदभाषी दीपक पटेल इस बार मजबूती से लड़ते दिख रहे हैं। दलित व मुस्लिम वोटों को अगर दीपक समेटने में सफल रहे तो इस बार भी वे निकलते दिख रहे हैं। भाजपा ने यहां से पीयूष रंजन निषाद को टिकट दिया है। जो कि टाइल्स के व्यापारी हैं। पहली बार चुनाव लड़ रहे है। दलित वोट के साथ अगर भाजपा के वोट को समेटने में सफल हुए तो मुख्य लड़ाई में आ सकते हैं।

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