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उम्मीद के आखिरी छोर तक…….

नित्या जायसवाल

लोग कहते हैं कि स्त्रियां घर बर्बाद करती हैं जबकि मेरा मानना है कि एक स्त्री कुछ भी बर्बाद नहीं जाने देतीं

बल्कि वो सहेजती हैं, संभालती हैं, ढकती हैं, बाँधती हैं।
उम्मीद के आखिरी छोर तक…
कभी तुरपाई कर के, कभी टाँका लगा के, कभी धूप दिखा के, कभी हवा में सुखा के, कभी छाँटकर तो कभी बीनकर, कभी तोड़कर तो कभी जोड़कर।

देखा होगा आपने अपने ही घर में अपनी माँ बहनों को…
खाली डब्बे को आपस में जोड़ते हुए, बची थैलियाँ को संभालकर मोड़ते हुए।
सबेरे की रोटी शाम को खाते हुए, बासी सब्जी में तड़का लगाते हुए।
दीवारों की सीलन तस्वीरों से छुपाते हुए, बचे हुए से अपनी थाली सजाते हुए।

चाहे फटे हुए कपड़े हों या शर्ट का टूटा हुआ बटन हो।
फंफून्दी लगा हुआ अचार हो या नर्म सीले हुए पापड़ हों।
घुन लगी दाल हो या गला हुआ फल हो।
मुरझाई हुई सब्जी हो या फिर तकलीफ देता ष् रिश्ता ष्
अक्सर वो सभी को सहेजती हुई ही मिलती हैं।

संभालती हैं, ढकती हैं, बाँधती हैं
उम्मीद के आखिरी छोर तक…

इसलिए याद रखना ए इंसान !
वो जिस दिन मुँह मोड़ेंगी
तुम उस दिन घर की बर्बादी देखोगे।

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