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कोजागरी व्रत से अतुल धन- संपत्ति की होती है प्राप्ति

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पं. प्रसाद दीक्षित
धर्म, कर्मकांड एवं प्रख्यात
-आज कोजागरी व्रत  है
वाराणसीं। आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को भगवती महालक्ष्मी रात्रि में यह देखने के लिए घूमती है कि कौन जाग रहा है। जो जाग रहा है उसे धन देती हैं। लक्ष्मी जी की को जाग्रति के कारण इस व्रत का नाम ‘कोजागर‘ पड़ा है। इस व्रत में पूर्णिमा ग्रहण करनी चाहिए तथा ऐरावत पर आरुण तथा महालक्ष्मी का पूजन करके उपवास करने का विधान है। रात्रि के समय गंध- पुष्प आदि से पूजित 100 या यथाशक्ति अधिक दीपक प्रज्वलित कर देव मंदिरों, बाग बगीचों, तुलसी के नीचे, भवनों में रखना चाहिए।

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प्रातः होने पर स्नान आदि से खाली होकर इंद्र का पूजन कर ब्राह्मणों को भी घी- शक्करमिश्रित खीर का भोजन कराकर वस्त्र आदि की दक्षिणा तथा स्वर्ण के दीपक देने से अनंत फल प्राप्त होता है। आज के दिन श्रीसूक्त, लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ ब्राह्मण द्वारा कराकर कमलगट्टा, बेल या पंचमेवा अथवा खीर द्वारा दशांश हवन करना चाहिए। कोजागरी व्रत के विषय में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है-
मगध देश में वलित नामक एक अयाचकव्रती ब्राह्मण था। उसकी पत्नी चंडी अति कर्कशा थी। वह ब्राह्मण को ताने देती कि मैं किस दरिद्र के घर आ गई हूं। वह संपूर्ण लोक में पति की निंदा ही किया करती थी। पति के विपरीत आचरण करना ही उसने अपना धर्म बना रखा था। वह पापिनी रोज पति को राजा के यहां से चोरी करने को उकसाया करती थी। एक बार श्राद्ध के समय उसने पिंडों को उठाकर कुएं में फेंक दिया। इससे अत्यंत दुखी होकर ब्राह्मण जंगल में चला गया, जहां उसे नागकन्याएं मिली। उस दिन आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि थी। नागकन्याओं ने ब्राह्मण को रात्रि जागरण कर लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने वाला कोजागर व्रत करने को कहा। व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण के पास अतुल धन- संपत्ति हो गई। भगवती लक्ष्मी की कृपा से उसकी पत्नी चंडी की भी मति निर्मल हो गई तथा वे दंपत्ति सुख पूर्वक रहने लगे।

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बुधवार शरद पूर्णिमा-
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ‘शरदपूर्णिमा‘ कहलाती है। इस व्रत में प्रदोष तथा निशिथ दोनों में होने वाली पूर्णिमा ली जाती है। शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की चांदनी में अमृत का निवास होता है। इसलिए उसकी किरणों में आरोग्य की प्राप्ति सुलभ होती है। इस दिन प्रातः काल अपने आराध्य देव को सुंदर वस्त्र आभूषण से सुशोभित करके उनका यथा विधि षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। अर्ध रात्रि के समय गाय के दूध से बनी खीर का भगवान को भोग लगाना चाहिए। फिर खीर से भरे पात्र को रात में खुली चांदनी में रखना चाहिए। इसमें रात्रि के समय चंद्र किरणों द्वारा अमृत गिरता है। पूर्ण चंद्रमा के मध्य आकाश में स्थित होने पर उनका पूजन कर अर्घ देना चाहिए। दूसरे दिन खीर का सेवन स्वयं एवं परिवार के सभी सदस्यों को करना चाहिए ताकि वह सभी लोग वर्षपर्यंत आरोग्य सुख का लाभ ले सके। आज के दिन कांस्यपात्र में घी भर कर स्वर्णसहित ब्राह्मण को दान देने से मनुष्य ओजस्वी होता है। अपरान्ह में हाथियों का निराजन करने का भी विधान है। भगवान श्री कृष्ण ने इसी दिन को रासलीला की थी, इसलिए ब्रज में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसे ‘रासोत्सव- या कौमुदी महोत्सव‘ भी करते हैं।

PLOT

मंगलवार 23 अक्टूबर- आश्विन मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि रात्रि 10.06 तक, भद्रा रात्रि 10.06 से प्रारंभ, कोजागरी 15
बुधवार 24 अक्टूबर- आश्विन मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि रात्रि 10.18 तक, पूर्णिमा 15, शरद पूर्णिमा, वाल्मीकि जयंती, मीरा बाई जयंती, भद्रा दिन में 10.12 तक
गुरुवार 25 अक्टूबर- कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि रात्रि 10.00 तक

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