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खुशहाल विश्व की रचना हर किसी की जिम्मेदारी : दलाई लामा

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विजय श्रीवास्तव
-दो दिवसीय सेमीनार का परम पावन ने किया उद्घाटन
-देश विदेश के दो सौ विद्धानों ने लिया भाग
वाराणसी। तिब्बतियों के सर्वोच्च धर्मगुरू परम पावन दलाई ने कहा कि विश्व की बदलती परिस्थियों में यह हम सब की जिम्मेदारी है कि हम मानव मन का रचनात्मक प्रयोग कर एक खुशहाल विश्व की रचना में अपना योगदान दें, यह वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, धर्म का आचरण करने वालों के साथ-साथ हम सभी की जिम्मेदारी है। उक्त बातें आज केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, वाराणसी में आयोजित माइण्ड इन इण्डियन फिलॉसाफिकल स्कूल ऑफ थाट एण्ड माडर्न साइन्सेस (भारतीय दार्शनिक प्रस्थानों एवं आधुनिक विज्ञान में मन की अवधारणा) विषयक अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेन्स के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए परम पावन दलाई लामा जी ने कही।

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दो दिवसीय काॅन्फ्रेन्स उन्होंने कहा कि हम सब इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ में हैं, इससे पूर्व सदियों तक मानव मन का विध्वंसक प्रयोग ही अधिक हुआ है। प्राचीन समय में युद्ध एक व्यक्ति या देश के विध्वंस के लिए होते थे किन्तु आज अत्यंत विध्वंसकारी अस्त्र-शस्त्रों के कारण यह मानवता के विध्वंस का हेतु बन गए हैं। इनके प्रयोग से सभी का पारस्परिक नुकसान सुनिश्चित है। प्रत्येक लड़ाई या युद्ध का कारण घृणा तथा क्रोध है। अतः हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने भीतर तथा साथ ही आने वाली पीढ़ियों में करुणा और प्रेम की भावना के विकास का प्रयास करें।
परम पावन दलाई लामा ने कहा कि पिछली सदी के वैज्ञानिकों ने अपना पूरा ध्यान वाह्य जगत की खोज पर केन्द्रित किया हुआ था किन्तु इधर कुछ वर्षों से वैज्ञानिक समुदाय में मनुष्य की आभ्यांतरिक प्रवृत्तियों पर शोध करने की रुचि जागृत हुयी है। जबकि धर्म और दर्शन हजारों वर्षों से मानव मन के रुपान्तरण पर ही कार्य कर रहे हैं। मन की भावनाओं को समझना और तद्नुसार प्रतिक्रिया करना हमें तमाम समस्याओं से बचा सकता है। यह व्यक्ति समाज और देश सहित सम्पूर्ण पृथ्वी के लिए पूर्णतः सत्य है। हम सभी को इस बात पर अवश्य ही विचार करना चाहिए कि हम इस, पृथ्वी पर खुश रहने और लोगों को खुश रखने का माध्यम बनते हैं या कि दुखी रह कर दूसरों के दुख का हेतु, किसी की हत्या करके कोई कैसे सुखी हो सकता है। हम सभी मानवता का एक हिस्सा हैं, यदि विश्व के किसी भाग में कोई दुखी है तो निश्चित रुप से हमें प्रार्थना के साथ-साथ उसके दुख के निवारण का उपाय भी करना चाहिए केवल प्रार्थना मात्र से यह सम्भव नहीं है। अतः वैज्ञानिकों और धर्म-दर्शन के अध्येताओं व धर्म के मार्ग का अनुसरण करने वाले सभी लोगों का एक साथ मानव मन पर विचार करना निश्चित रूप से मानवता के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा। यह कान्फ्रेंस निश्चित रूप से इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी।कान्फ्रेंस का विषय प्रवर्तन करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन जी ने कहा कि इस कान्फ्रेंस में भारतीय ज्ञान परम्परा की सांख्य, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, बौद्ध व जैन परम्पराओं के विद्वानों तथा साधकों का आधुनिक वैज्ञानिकों के साथ मानव मन के विभिन्न आयमों पर संवाद किया जाएगा। प्रो. समतेन जी ने कहा कि मन हमारे अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण अवयव हैं, मन के रुपान्तरण के बिना आभ्यांतरिक व वाह्य शान्ति की स्थापना संभव नहीं है। 

कान्फ्रेंस के प्रथम सत्र का संचालन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. जोश केब्जन ने किया इस सत्र में मुम्बई की प्रो. शुभदा जोशी ने सांख्य दर्शन में मन की अवधारणा पर तथा जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रो. रूपा बन्दोपाध्याय नें अद्वैत दर्शन में मन एवं अहं का विश्लेषण विषय पर शोध पर पस्तुत किए।
कान्फ्रेंस के द्वितीय सत्र का संचालन भरतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रो. एस. आर. भट्ट ने किया इस सत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. सच्चिदानन्द मिश्र ने न्याय दर्शन में समष्टि मन की अवधारणा, रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द विश्वविद्यालय के कुलपति स्वामी आत्मप्रियानन्द जी ने बौद्ध, योग तथा वेदान्त दर्शन में मन की अवधारणा तथा प्रो. भाग चन्द्र जैन ने जैन दर्शन में मन के स्वरूप व कार्य विषय पर शोध पर प्रस्तुत किए।

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