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जीवित्पुत्रिका व्रत 2 अक्टूबर को, शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और व्रत कथा

P PRASHAD

पंडित प्रसाद दीक्षित
धर्म, कर्मकांड एवं ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ
न्यासी, काशी विश्वनाथ मन्दिर, वाराणसी
-जीवित्पुत्रिका व्रत पुत्र के दीर्घायु के लिए किया जाता है
वाराणसी। 2 अक्टूबर यानि मंगलवार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पुत्र के आयु-आरोग्य लाभ तथा समृद्ध कल्याण के लिए जीवित्पुत्रिका जितिया व्रत है। जिसे महिलाए अपने पुत्र के दीर्घायु के लिए इस व्रत को विधि विधान से करती हैं। यह एक कठिन व्रत है।
इस बारें में पंडित प्रसाद दीक्षित, धर्म, कर्मकांड एवं ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ ने विस्तार से बताते हुए कहा प्रदोष प्रदोषव्यापीनी अष्टमी को अंगीकार करते हुए आचार्यों ने प्रदोष काल में जीमूतवाहन की पूजन का विधान स्पष्ट शब्दों में लिखा है। आज के दिन पवित्र होकर संकल्प के साथ प्रदोष काल में गाय के गोबर से अपने प्रांगण को महिलाओं को परिष्कृत करना चाहिए। साथ ही छोटा सा तालाब भी जमीन खोदकर बनाना चाहिए। तालाब के निकट एक पाकड़ की डाल लाकर खड़ा कर दें। शालिवाहन राजा के पुत्र धर्मात्मा जीमूतवाहन की कुशनिर्मित मूर्ति जल या मिट्टी के पात्र में स्थापित कर पीली और लाल रुई से उसे अलंकृत कर तथा धूप, दीप, अक्षत, फूल, माला एवं विविध प्रकार से पूजन करना चाहिए। मिट्टी तथा गाय के गोबर से चिल्ली और सियारिन की मूर्ति बनाकर उनके मस्तकों को लाल सिंदूर से भूषित करना चाहिए। अपने वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए उपवास कर बांस के पत्रों से पूजन करना चाहिए। व्रत महत्व की कथा श्रवण करना चाहिए। अपने पुत्रों की लंबी आयु एवं सुंदर स्वास्थ्य की कामना से महिलाओं को विशेषकर सधवा को इस व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए।

प्रस्तुत कथा के वक्ता वैशंपायन ऋषि हैं। बहुत पहले रमणी कैलाश पर्वत के शिखर पर भगवान शंकर और माता पार्वती प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए थे। परम दयालु माता गौरी ने महादेव जी से पूछा प्रभु किस व्रत एवं पूजन से सौभाग्यशालिनी नारियों के पुत्र जीवित एवं चिरंजीवी बने रहते हैं, कृपया उसके बारे में और उसकी कथा के विषय में बताने का कष्ट करें। त्रिकालदर्शी भगवान शंकर ने जीवित्पुत्रिका जितिया व्रत के विधान महत्व तथा महात्मा की कथा बताया। दक्षिण में समुद्र के किनारे नर्मदा के तट पर कांचनवती नाम की एक सुंदर नगरी थी। वहां के राजा मलयकेतु थे। उनके पास चतुरंगिणी सेना थी। उनकी नगरी धन-धान्य से परिपूर्ण थी। नर्मदा के पश्चिमी तट पर एक मरुस्थल था, वहां एक पाकड़ का पेड़ था। उसकी जड़ में एक बड़ा सा कोटर था। उसमें छिपकर एक सियारिन रहती थी। उसकी डाल पर घोंसला बनाकर एक चिल्ली भी रहती थी। रहते- रहते दोनों में मैत्री हो गई थी। संयोगवश उस नदी के किनारे स्त्रियां पुत्रों के आयुष्य और कल्याण की कामना से जीमूतवाहन का व्रत एवं पूजन कर रही थी। उनसे सब कुछ जानकर चिल्ली और सियारिन ने व्रत करने का संकल्प लिया। व्रत करने के कारण भूख लगनी स्वाभाविक थी। चिल्ली ने भूख सहन कर रात बिता दी परंतु सियारिन भूख से छटपटाने लगी। नदी के किनारे जाकर एक जले हुए मांस भरपेट खाकर और पारणा के लिए मांस के टुकड़े लेकर फिर कोटर में आ गई। डाल के ऊपर से चिल्ली सब कुछ देख रही थी। चिल्ली ने व्रती महिलाओं से अंकुरित मटर लेकर ठीक से पारण कर ली। सियारिन बहुत धूर्त थी और चिल्ली अधिक सात्विक विचार वाली थी। कुछ समय के बाद दोनों ने प्रयाग आकर तीर्थ सेवन शुरू किया और अपने मन में चिल्ली ने संकल्प लिया कि मैं महाराज के महामंत्री बुद्धसेन की पत्नी बनूंगी। इस संकल्प एवं मनोरथ के साथ अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। उधर सियारिन ने भी मैं महाराज मलयकेतु की रानी बनूंगी। इस मनोरथ और संकल्प के साथ अपने प्राणों का त्याग किया। दोनों का जन्म भास्कर नामक ब्राह्मण के घर में हुआ। दोनों कन्याओं में नागकन्या और देवकन्या की असाधारण गुण लक्षित हो रहे थे। चिल्ली का नाम जहां शीलवती रखा गया वहीं सियारिन का नाम कर्पूरआवती रखा गया। शीलवती का विवाह मंत्री बुद्धसेन से हुआ और कर्पूरआवती का विवाह राजा मलयकेतु के साथ हुआ। राजा और मंत्री दोनों धर्मात्मा एवं न्यायवादी थे स प्रजा को राजा अपने पुत्र के समान मानता था। समय के अनुसार शीलवती एवं कर्पूरआवती को सात सात पुत्र हुए। कर्पूरआवती के सातों पुत्र के एक-एक करके काल के गाल में समा गए अर्थात मर गए। शीलवती के सभी पुत्र हमेशा राजा की सेवा में हाजिर रहते थे और राजा के आज्ञाकारी थे। रानी उन्हें देखकर जलती थी। एक दिन रानी ने रूठ कर खाना पीना और बोलना भी बंद कर दिया। राजा से दूर एकांत कोठरी में पड़ी हुई थी। राजा को जब मालूम हुआ तो उसे मनाने गए तथा उसने उनकी एक भी नहीं सुनी। राजा ने कहा कि तुम जो कुछ कहोगी मैं वही करूंगा। उसने कहा कि यदि यह सत्य है तो शीलवती के सभी पुत्रों का सिर काट कर दीजिए। ऐसा नहीं चाहते हुए भी राजा ने वही किया जो रानी चाहती थी। रानी ने डाला या बर्तन में एक-एक सिर रखकर और उसे कपड़े से ढककर शीलवती के पास भेजा। इधर जीमूतवाहन ने उनकी गर्दन को मिट्टी से जोड़कर एवं अमृत छिड़ककर उन्हें पुनः जीवित कर दिया स सौगात के रूप में भेजे गए सभी सिर ताल के फल बन गए। यह जानकर रानी तो और आगबबूला हो गयी। वह क्रोध के मारे अत्यंत कुपित हो गई और डंडा लेकर शीलवती को मारने पहुंच गई, लेकिन भगवान की दया से शीलवती को देखते ही उसका क्रोध शांत हो गया। शीलवती उसे लेकर नर्मदा के तट पर चली गई। दोनों ने स्नान किया। बाद में शीलवती ने पूर्व जन्म की याद दिलाते हुए उसे बताया कि तुमने सियारिन के रूप में व्रत को भंग कर मुर्दा खा लिया था। उसे सब कुछ याद आ गया स ग्लानि और संताप से उसके प्राण निकल गए। राजा को जब मालूम हुआ तो उसने अपना राज्य मंत्री को सौंप दिया और स्वयं तप करने चले गए। शीलवती अपने पति और पुत्रों के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगी। जितियाव्रत के प्रभाव से उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो गए । इसी प्रकार महात्मा की कथा बताने के अनंतर भगवान शंकर ने कहा कि जो सौभाग्यवती स्त्री जीमूतवाहन को प्रसन्न करने के लिए व्रत एवं पूजन करती है एवं कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देती है, वह अपने पुत्रों के साथ सुख पूर्वक समय बिताकर अंत में विष्णु लोग प्रस्थान करती है।
पांचांग:
मंगलवार 2 अक्टूबर- आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रात्रि 12.22 तक, जीवित्पुत्रिका व्रत, श्रीमहालक्ष्मी व्रत, श्री महालक्ष्मी व्रत समापन
बुधवार 3 अक्टूबर- आश्विन मास कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि रात्रि 10.02 तक, जीवित्पुत्रिका व्रत पारणा, मातृनवमी, दुर्गा नवमी (महाराष्ट्र), अविधवा नवमी

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