देश में 1900 राजनीतिक पार्टी रजिस्टर्ड, 200 का आस्तित्व खतरें में

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विजय श्रीवास्तव

-चुनाव आयोग का चलेगा चाबुक
– देश में 7 राष्ट्रीय पार्टी कार्यरत वहीं 58 राज्य स्तरीय पार्टी
-250 पार्टियों पर कालाधन सफेद करने का आरोप
-200 से अधिक पार्टियों ने नहीं लड़ी कभी चुनाव
-कई पार्टियों के पते फर्जी या काफी समय से बंद
वाराणसी। कागजों पर दौड़ रही राजनीतिक पार्टियां अब चुनाव आयोग के रडार पर हैं। चुनाव आयोग ने इन पर कार्रवाही करने का निर्णय ले लिया है। जिसमें 200 से अधिक ऐसी पार्टियों का आस्तित्व खतरें में हैं जो केवल कागजों पर ही चल रही हैं। देशभर में आज 1900 राजनीतिक दल हैं, इनमें 7 राष्ट्रीय दल, 58 क्षेत्रीय दल हैं, इसमें करीब 1500 पार्टियां ऐसी हैं जिन्होंने कभी चुनाव में अपनी जोरआजमाईस ही नहीं की।
चुनाव आयोग अब ऐसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ आरपार की लड़ाई के मूड में हैं। वे ऐसे राजनीतिक पार्टियों की सूची सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स यानि सीबीडीटी को देने का मन बना रही है, जिससे इन पार्टियों के वित्तीय लेनदेन की सही जानकारी मिल सके। चुनाव आयोग का मानना है कि ऐसी फर्जी पार्टियां सिर्फ इसलिए बनायी जाती हैं कि इनके जरिए काले धन को सफेद किया जा सके। चुनाव आयोग ऐसी लगभग 250 पार्टियों की सूची बना रहा है जो इस काम में लगे हैं।
गौरतलब है कि काफी समय से राजनीतिक पार्टियां बनाकर काले धन को सफेद करने का खेल हो रहा है और इसीलिए उसने करीब 200 ऐसी पार्टियों की लिस्ट तैयार की है जो सिर्फ कागजों पर हैं। .एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानि एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाली 75 फीसदी रकम बेनामी है, यानि जिसका कोई स्त्रोत ही नहीं है। एडीआर की सबसे ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी को इस साल 76 करोड़ 85 लाख की रकम ऐसे चंदे से मिली जो 20 हजार से ज्यादा थी। जबकि पिछले साल ये रकम 437 करोड़ 35 लाख थी। कांग्रेस को इस साल 20 हजार रुपए से ऊपर 20 करोड़ 42 लाख ही चंदा मिला, जबकि पिछले साल ये रकम 141 करोड़ 46 लाख थी। वहीं बीएसपी का दावा है कि इस बार उसे एक भी ऐसा चंदा नहीं मिला जो 20 हजार से ज्यादा का हो। गौरतलब है कि राजनीतिक पार्टियां ना तो आरटीआई के दायरे में आती हैं, ना ही उन्हें इनकम टैक्स देना होता है, और ना ही 20 हजार से नीचे मिले गुप्त चंदे का हिसाब देना पड़ता है। इसी लिए विगत दिनों चुनाव आयोग ने 20 हजार की राशि को 2 हजार रूपये करने का प्रस्ताव दिया है। अब देखना है कि चुनाव आयोग की यह मुहिम को सरकार के साथ राजनीतिक पार्टी कितना सहयोग देते हेैं, क्योंकि बिना सरकार के सहयोग से चुनाव आयोग भी एक सीमा तक ही सुधार कर सकता है।

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