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देश रत्न डाॅ राजेन्द्र प्रसाद सच्चे अर्थो में संविधान निर्माता थे : अरविन्द श्रीवास्तव

विजय श्रीवास्तव
-राजेन्द्र प्रसाद अगर पहले शिक्षा या कानून मंत्री होते तो देश की दशा व दिशा कुछ और होती: मोहन कुमार श्रीवास्वत
-आज कुछ लोग ऐसे विभूतियों को भूलाने हासिएं पर लाने की कोशिश कर रहे हैं: विजय प्रकाश श्रीवास्तव
-राजेन्द्र प्रसाद का जीवन सरल व देश को पूरी तरह से समर्पित था: प्रो.करूणा शंकर मिश्र
-डाॅ राजेन्द्र प्रसाद के जन्मदिवस को न्याय दिवस के रूप में मनाने की मांग

वाराणसी । देश के संविधान निर्माता की अगर बात की जाये तो उसके हकदार सिर्फ व सिर्फ देश रत्न डाॅ राजेन्द्र प्रसाद थे और कोई नहीं। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह संविधान का कार्य एक सामूहिकता में सम्पन्न हुआ और बहुत से लोंगो ने अपनी भूमिका निभायी। उन सबका सम्मान होना चाहिए। उक्त बातें आशापुर में सारनाथ कायस्थ समिति के बैनर तले देश रत्न डाॅ राजेन्द्र प्रसाद के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में चित्रगुप्त सभा काशी के महामंत्री अरविन्द्र श्रीवास्तव ने कही।

उन्होंने कहा कि इस देश में कई बार यह देखा गया है कि बिना लडें जंग जीता गया है। यह देश में बार-बार हुआ है। यह हमारें संविधान निर्माता डाॅ राजेन्द्र प्रसाद के साथ भी हुआ। आज जिस तरह से मोहल्लों-गलियों में पत्थरों पर संविधान निर्माता का जिक्र किया जा रहा है, उससे हम सच्चे अर्थो में संविधान निर्माता को भूल जायेंगे। इसके लिए हमे सजग रहना चाहिए। जहां तक चंपारन आन्दोलन की बात की जाए तो उसने देश की राजनीति को बहुत कुछ दिया। चंपारन आन्दोलन का अकेले नेतृत्व डाॅ राजेन्द्र प्रसाद ने किया लेकिन जब इस दौरान महात्मा गांधी पहुचते हैं। तो दो बात जो बहुत ही महत्वपूर्ण रही, एक तो डाॅ प्रसाद ने महात्मा गांधी को पहली बार राष्ट्रपिता की उपाधि दी वहीं दूसरी बात पहली बार किसी ने अगर यह महसूस किया कि स्वंतन्त्रता की लडाई में किसी नेतृत्व की जरूरत है और उन्होंने इसके लिए महात्मा गांधी का नाम लेते हुए उन्हें आगे किया। हम इस बात से डाॅ राजेन्द्र प्रसाद की महानता व सहजता का अनुमान लगा सकते हेैं। यह इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं यह और बात है कि इतिहास बदलती है और शायद आज देखने को भी मिल रहा है। इतिहासकार अपने ढंग से अपना एंगल डालता है या कुछ लोंगो द्धारा डलवाया जाता है। जो आज देखने को मिल रहा है।

इस दौरान रेलवे गृहनिर्माण लोहिया नगर समिति के अध्यक्ष प्रो. करूणा शंकर मिश्र ने बीएचयू में डाॅ राजेन्द्र प्रसाद के विद्यार्थियों के लिए व विद्यार्थियों के बीच के उद्बोधन का वर्णन करते हुए कहा कि अविस्मणीय था। अपने पूरे भाषण में उन्होंने एक शब्द भी राजनीति पर नहीं बोला, सिर्फ अध्ययन के विविध पहलूओं पर ही प्रकाश डाला। इस दौरान उन्होंने उनके राष्ट्रपति भवन के कुछ प्रसंगों पर चर्चा करते हुए उनके सादगी व सहजता पर प्रकाश डाला। इस दौरान वरिष्ठ अध्यापक राहुल श्रीवास्तव ने डाॅ राजेन्द्र प्रसाद के जीवन वृत पर प्रकाश डालते हुए एक पं्रसग की चर्चा की जब 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू करने के लिए उसे सौपना था तो उसके एक दिन पूर्व उनकी सगी बहन की मृत्यु हो गयी, लेकिन उन्होंने पहले देश में संविधान हेतू कार्यक्रम में शिरकत के बाद ही अपने बहन के घर गये। इस दौरान प्रेम शंकर विद्यार्थी जी ने रांची में राष्ट्रपति के रूप में पधारे डाॅ राजेन्द्र प्रसाद के बेवजह खर्च सहित कई संस्मरण सुनाया।

इस दौरान मजदूर यूनियन संघ से जुडे विजय प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि ऐसी महान विभूति हमारें बीच आयी और चली गयी लेकिन हैरत इस बात की है कि आज भी हम सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। एक आदर्श को लेकर एक व्यक्ति जन्म लेता है और ज्योहिं वह समझदार होता है, एक भाव व विचार आता है और पल भर में वह सब कुछ भूला देता है जिसने हमें बहुत कुछ दिया। एक ऐसा व्यक्ति जो एक ओर कुशाग्र बुद्धि तो वहीं दूसरी ओर सरल व सहजता का प्रतिमूर्ति, लेकिन आज के दिन भी हम उसे याद करने से गुरेज कर रहे हैं।


संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए खादी ग्राम उद्योग के पूर्व निदेशक मोहन लाल श्रीवास्तव ने कहा कि डाॅ राजेन्द्र प्रसाद की सबसे बडी खासियत यह रही कि उन्होंने स्वंय को अन्तिम आदमी के स्थान पर रखने की कोशिश की लेकिन यह शायद इस देश का दुर्भाग्य रहा कि ऐसे प्रकांण्ड विद्वान कानून का ज्ञाता को कृषि जैसे विभाग का मंत्री बनाया गया। अगर उन्हें शिक्षा व कानून मंत्री बनाया गया होता तो शायद इस देश की दशा व दिशा कुछ और होती। हमलोंगो ने ‘‘लमहों में खता की है और सदियों में सजा पायी है‘‘। इस दौरान उन्होंने डाॅ प्रसाद के कई संस्मरण को भी सुनाया।
इस दौरान संगोष्ठी में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास किया गया कि डाॅ राजेन्द्र प्रसाद के जन्म दिन को न्याय दिवस के रूप में
संगोष्ठी का संचालन सारनाथ कायस्थ समिति के संस्थापक सदस्य हरि शंकर सिन्हा ने किया। इस दौरान सर्वश्री एस के सिन्हा, आशीष वर्मा, विजय श्रीवास्त, भगत श्रीवास्तव, अनुराग श्रीवास्तव आदि लोगों ने भी अपने विचार व्यक्त किया।

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