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नवरात्रि का चौथा दिन : सूर्यलोक में करती हैं निवास देवी कुष्मांडा

Kushmanda-devi
पं. प्रसाद दीक्षित
धर्म, कर्मकांड एवं प्रख्यात ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ
वाराणसी। नवरात्रि के चतुर्थ दिन मां कुष्मांडा के दर्शन व पूजन का विधान है। मां कुष्मांडा का निवास स्थान सूर्यलोक में माना जाता है। सूर्यलोक में निवास करने की शक्ति और क्षमता केवल मां कुष्मांडा में ही है। इनके स्वरूप का तेज और कांति सूर्य के समान ही है। पवित्र एवं शुद्ध मन से नवरात्रि के चतुर्थ दिन मां कुष्मांडा की आराधना कर भक्त अपनी आंतरिक प्राणशक्ति को ऊर्जावान बनाते हैं।
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कुष्मांडा का अभिप्राय कद्दू से है। एक पूर्ण गोलाकार वृत्त की भांति मानव शरीर में स्थित प्राणशक्ति दिन रात सभी जीव- जंतुओं का कल्याण करती है। प्राणशक्ति, बुद्धिमत्ता तथा शक्ति की वृद्धि करती है। ‘‘कू‘‘ का अर्थ है छोटा, ऊर्जा और अंड का अर्थ है ब्रह्मांडीय गोला। धर्मग्रंथों में मिलने वाले वर्णन के अनुसार अपनी मंद और हल्की सी मुस्कान मात्र से अंड को उत्पन्न करने वाली होने के कारण ही इन्हें कूष्मांडा कहा गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था तथा चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब कुष्मांडा देवी ने महाशून्य में अपने मंद हास से उजाला करते हुए अंड की उत्पत्ति की, जो की बीज रूप में ब्रह्म तत्व से मिला एवं ब्रह्मांड बना। इस प्रकार मां दुर्गा का यही अजन्मा और आद्यशक्ति रूप है। जीव में इनका स्थान ‘अनाहत चक्र‘ माना गया है।
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नवरात्र के चतुर्थ दिन योगीजन इसी चक्र में अपना ध्यान लगाते हैं। इनके स्वरूप ज्योति मंडल विश्व के समान ही अतुलनीय है। कुष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल, पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में अमृत कलश भी है। इनका वाहन सिंह है और इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कुष्मांडा अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। मां के पूजन से परम पद की प्राप्ति होती है। आज के दिन देवी को पंचमेवा का भोग लगाना तथा लाल पुष्प अर्पित करना श्रेयस्कर होगा। सफेद पुष्प अर्पित ना करें। सर्वोत्तम लाभ प्राप्त होगा।

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