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नवरात्रि का पांचवा दिन : देवी स्कंदमाता की आराधना से सफलता एवं सिद्धि की होती है प्राप्ति

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पं. प्रसाद दीक्षित
धर्म, कर्मकांड एवं प्रख्यात ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ
-देवी स्कंदमाता नहीं करती हैं कोई शस्त्र धारण
वाराणसी। नवरात्र के पांचवे दिन स्कंदमाता की आराधना करने से भक्त अपने व्यवहारिक ज्ञान को कर्म में परिवर्तित करते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार देवी का यह रूप इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का समागम है। जब ब्रह्मांड में व्याप्त शिव तत्व का मिलन त्रिशक्ति के साथ होता है तो इस स्कंद का जन्म होता है।

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पं. प्रसाद दीक्षित ने बताया कि देवी स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्तोत्र आरंभ का प्रतीक मानी गई हैं। जातक को सही दिशा का ज्ञान ना होने के कारण वह विफल हो जाता है। माता स्कंद की आराधना करने वालों को भगवती जीवन में सभी दिशा में ज्ञान का उपयोग कर उचित कर्मों द्वारा सफलता एवं सिद्धि प्रदान करती हैं। योगीजन इस दिन ‘विशुद्ध चक्र‘ में अपना मन एकाग्र करते हैं। यही चक्र प्राणियों में स्कंद माता का स्थान है। स्कंदमाता का विग्रह चारभुजा वाला है। यह अपनी गोद में भगवान स्कंद को बैठाती हैं। दाहिनी ओर कि ऊपर वाली भुजा से धनुष बाणधारी छह मुखों वाले षडानन बाल रूप स्कंध को पकड़े रहती हैं, जबकि बाई ओर की ऊपर वाली भुजा आशीर्वाद एवं वर प्रदाता मुद्रा में रखती है। नीचे वाली दोनों भुजाओं में माता कमल पुष्प रखती है। इनका वर्ण पूरी तरह निर्मल कांतिवाला सफेद है। यह कमलासन पर विराजती हैं। इनका वाहन सिंह है। कमलासन वाली स्कंद माता को ‘पद्मासना‘ भी कहा जाता है। यह वात्सल्य विग्रह हैं, अतः कोई शस्त्र धारण नहीं करती।

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देवी स्कंदमाता की कांति का अलौकिक प्रभा मंडल इनके उपासक को भी मिलता है। इनकी उपासना से साधक को परम शांति और सुख मिलता है। उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती है और वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर बढ़ता है। जातक की कोई लौकिक कामना शेष नहीं रहती। आज के दिन देवी को मिश्री का भोग लगाएं तथा लाल पुष्प चढ़ाना श्रेयस्कर होगा। पीला पुष्प वर्जित है स देवी दुर्गा के नवार्ण मंत्र का 108 बार जप करें। सर्वोत्तम लाभ प्राप्त होगा।

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