Breaking News

नाग पंचमी 15 अगस्त बुधवार को : पंडित प्रसाद दीक्षित

 

naag_panchm

पंडित प्रसाद दीक्षित,
ज्योतिर्विद् एवं न्यासी
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी
-पंचमी तिथि बुधवार को प्रातः 7.24 से प्रारंभ होकर दूसरे दिन गुरुवार प्रातः 6.08 तक रहेगी
-जानिए नागपंचमी की विस्तार से कथा
वाराणसी। उत्सव प्रियता भारतीय जीवन की प्रमुख विशेषता रही है। देश में समय-समय पर अनेक पर्व एवं त्योहारों का भव्य आयोजन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैै। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का त्यौहार नागों को समर्पित है। इस त्यौहार पर व्रत पूर्वक नागों का अर्चन-पूजन होता है। वेद एवं पुराणों में नागों का उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से माना गया है। नागों का मूल स्थान पाताललोक प्रसिद्ध है। पुराणों में ही नागलोक की राजधानी के रूप में भोगवतीपुरी विख्यात है।

DR DHARM PRIYA 123
संस्कृत कथा साहित्य में विशेष रूप से कथासरितसागर नागलोक और वहां के निवासियों की कथाओं से ओतप्रोत है। गरुड़पुराण, भविष्यपुराण, चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, भाव प्रकाश आदि ग्रंथों में नाग संबंधी विविध विषयों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में यक्ष, किन्नर और गंधर्वो के वर्णन के साथ नागों का भी वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु की शैया की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। भगवान शिव और गणेश जी की अलंकरण में भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका है। योग सिद्धि के लिए जो कुंडलिनी शक्ति जागृत की जाती है उसको सर्पिणी कहा जाता है। पुराणों में भगवान सूर्य के रथ में द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है, जो क्रमशः प्रत्येक मास में उनके रथ के वाहक बनते हैं। इस प्रकार अन्य देवताओं ने भी नागों को धारण किया है। नाग देवता भारतीय संस्कृति में देवरूप में स्वीकार किए गए हैं।

LOHIYA 1

कश्मीर के जाने-माने संस्कृत कवि कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक श्राजतरंगिणीश् में कश्मीर की संपूर्ण भूमि को नागों का अवदान माना है। वहां के प्रसिद्ध नगर अनंतनाग का नामकरण इसका ऐतिहासिक प्रमाण भी है। देश के पर्वतीय प्रदेशों में नाग पूजा बहुतायत से होती है। यहां नाग देवता अत्यंत पूज्य माने जाते हैं। हमारे देश के प्रत्येक ग्राम नगर में ग्राम देवता और लोक देवता के रूप में नाग देवताओं की पूजा स्थल भी हैं। भारतीय संस्कृति में प्रातः काल भगवत स्मरण की अनंत तथा वासुकी आदि पवित्र नागों का नाम स्मरण किया जाता है। जिनसे नाग विष और भय से रक्षा होती है। देवी भागवत में प्रमुख नागों का नित्य स्मरण किया गया ळें हमारे ऋषि-मुनियों ने नागों उपासना में अनेक व्रत पूजन का विधान किया है। इसी क्रम में श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी नागों को अत्यंत आनंद देने वाली है। पंचमी तिथि को नाग पूजा में उनको गो दुग्ध से स्नान कराने का विधान है। कहा जाता है कि एक बार मातृ शाप से नागलोक जलने लगा। इस दाह पीड़ा की निवृत्ति के लिए नाग पंचमी को गाय के दूध से जहां नागों को शीतलता प्रदान करता है वहां भक्तों को सब भय से मुक्ति भी देता है। नागपंचमी की कथा के श्रवण का बड़ा महत्व है। इस कथा के प्रवक्ता सुमंत मुनि थे तथा श्रोता पांडववंश के राजा शैतानीक थे।

sumedh 123456

नागपंचमी की कथा इस प्रकार है- एक बार देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन द्वारा 14 रत्नों में उच्चैरूश्रवा नामक अश्वरत्न प्राप्त किया था स यह अत्यंत श्वेतवर्ण का था। उसे देखकर नागमाता कद्रू तथा विमाता विनता दोनों में उसके रंग के संबंध में वाद विवाद हुआ। कद्रू ने कहा अश्व के केश श्याम वर्ण के हैं। यदि मैं अपने कथन में असत्य सिद्ध हो जाऊंगी तो मैं तुम्हारी दासी बनूंगी अन्यथा तुम मेरी दासी बनोगी। कद्रू ने नागों को बाल के समान सूक्ष्म बनकर अश्व के शरीर में आवेष्टित होने का निर्देश किया किंतु उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट की। इसपर कद्रू क्रुद्ध होकर नागों को शाप दिया कि पांडववंश के राजा जनमेजय नागयज्ञ करेंगे। उस यज्ञ में तुम सब जलकर भस्म हो जाओगे स क्रुद्ध नागमाता के श्राप से भयभीत नागों ने वासुकी के नेतृत्व में ब्रह्मा जी से श्राप मुक्ति का उपाय पूछा। ब्रह्मा जी ने निर्देश दिया यायावरवंश में उत्पन्न तपस्वी जरत्कारु तुम्हारे बहनोई होंगे। उनका पुत्र आस्तिक तुम्हारी रक्षा करेगा। ब्रह्मा जी ने पंचमी तिथि को नागों को यह वरदान दिया तथा इसी तिथि पर आस्तिक मुनि ने नागों का परिरक्षण किया था। अतः नागपंचमी का यह व्रत ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृृष्टि से महत्वपूर्ण है। हमारे धर्म ग्रंथों में सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजा का विधान है।

chandima 11

व्रत के साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत या मृतिका से नाग बनाकर पुष्प- धूप-दीप एवं विविध विधाओं से नागों का पूजन होता है। भाव यह है कि जो नाग पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, सूर्य की किरणों, सरोवरों, वापी, कूप तथा तालाब आदि में निवास करते हैं वह सब हम पर प्रसन्न हो। हम उनको बार-बार नमस्कार करते हैं। नागों की अनेक प्रजातियां और जातियां हैं। भविष्यपुराण में नागों के लक्षण, नाम स्वरूप एवं जातियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख मिलता है। भारत धर्म प्राण देश है। भारतीय चिंतन प्राणी मात्र में आत्मा और परमात्मा के दर्शन कराता है। यह दृष्टि ही जीवमात्र मनुष्य, पशु, पक्षी, पतंग सभी में ईश्वर के दर्शन कराती है। जीवो के प्रति आत्मीयता और दया भाव को विकसित करती है। अतः नाग हमारे लिए पूज्य और संरक्षण हैं अजय पूज्य एवं संरक्षणीय हैं। प्राणी शास्त्र के अनुसार नागों की असंख्य प्रजातियां हैं, जिनमें विश्व भरे नागों की संख्या बहुत कम है। यह नाग हमारी कृषि संपदा की कृषि नाशक जीव से रक्षा करते हैं। पर्यावरण सुरक्षा तथा वन संपदा में भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका है। नाग पंचमी का पर्व नागों के साथ जीवो के प्रति सम्मान, उनके संवर्धन एवं संरक्षण की प्रेरणा देता है।

 

Share

Related posts

Share