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नोटबंदी के निहितार्थ

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आलोक कुमार 
– देश की 90 प्रतिशत आबादी रोटी, कपड़ा व मकान के सपनों को पूरा करने के दौरान जन्म से मृत्यु का सफर पूरा कर लेती है।
– देश की सारी संपत्ति का 75-76 प्रतिशत कुछ लोगों के हाथ में है।
वाराणसी। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर को 500 व 1000 रूपये के प्रचलित नोट बंद करने की घोषणा की। इस कार्य के पीछे संशक्त तर्क था कालाधन और आंतकवाद पर प्रभावी नियंत्रण। बड़ा उद्देश्य और दूरगागी परिणाम का कदम। लोगों ने बहुत प्रंशसा की और इस साहसिक कदम का स्वागत भी किया। इसक साथ शुरू हुआ सूचना आदान-प्रदान करने का काम, माध्यम बना सोशल मीडिया। कुछ सूचनाएं आशा का संचार करती थी कुछ से व्यापक निराशा और भय उत्पन्न भी हुआ। कुछ परपीड़क मानसिकता से ग्रसित लोगों ने इस स्थिति का जमकर लाभ उठाया। 8 नवंबर से अफवाहों ने जोर पकड़ा इसके प्रभाव से महिलाए और बुजुर्ग परेशान रहे।
कुछ राजनीतिक दल नोटबंदी के खिलाफ खुलकर सामने आये हैं। सरकार और विपक्ष की जोर अजमाइश में जनता पिस कर रह गई सी लगती है। काले धन का मुद्दा बहुत बड़ा है और इसके खात्मे के लिए सारा देश एकजुट भी है। इस बड़ी मुहिम को चलाने के साथ इसके होने वाले अच्छे परिणाम के साथ आमजन को होने वाली परेशानी का आकलन सही तरीके से नहीं हुआ है। इन दिनों शादियां और फसल की बिक्री बुआई का काम होना है। बैंक लाचार हैं पैसे की निकासी का प्रबंध है नहीं, भीड़ बढ़ती जा रही हैं । अब क्या होगा। देश की सुप्रीम कोर्ट ने भी चिन्ता व्यक्त की है कि स्थिति और बिगड़ सकती है। सरकार के रोज बदलते फैसलों से संशय बढ़ा है। कभी नोट बदलना, कभी निकासी और कभी खातें में जमा को लेकर अलग-अलग बयान आते रहे हैं। इसके चलते स्थिति बिगड़ी है। ऐसे समय में नोटबंदी का समर्थक जमात खुद को राष्ट्रवादी और इसके विरोधी वर्ग को राष्ट्रविरोधी कहने का काम कर रही है। इस आरोप-प्रत्यारोप के चलते आम-जन का कष्ट बढ़ता जा रहा है। शादियां तय थी जो सकुशल हो जायें इसके जुगाड़ में परिवार के लोग लगे है। इस आपा-धापी के दौर में काला बजार को भी बल मिल रहा है। पुराने नोट की कम कीमत लगाकर सोना बेचना, नोट बदलने की कीमत वसूलने की खबरे आज हैं। कई राज्यों की सरकार भी इस जल्दबाजी के फैसले से नाराज है ओर अपना विरोध प्रकट कर रहे है। दिल्ली और पश्चिम  बंगाल के मुख्यमंत्री धरना, पैदल मार्च और सभा कर रहे हैं।
अगर मोटे तौर पर देखें तो विगत 8 नंवबर से देश के खेती बाजार, घर और सरकारी कामकाज बंद हैं। लोग लाइनों में खड़े हैं। समस्या है समाधान के आश्वासन हैं। इन आश्वासनो का खंडन भी है। इस दौरान कुछ रोचक तथ्य है , जो आम लोगो तक भी पहुंचते हैं-देश की सारी संपत्ति का 75-76 प्रतिशत कुछ लोगों के हाथ में है। जो दिन दूना रात चोैगुना बढ़ता जा रहा है। प्लास्टिक मनी को हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में जगह दिलाने का प्रयास हो रहा है।इसका कितना लाभ होगा यह तो समय बतायेगा । यह भी समीचीन है जिन देशो में नगद लेने-देन नही के बराबर है वे क्या पूर्ण तथा भ्रष्टाचार मुक्त हैं। वहां ड़े घोटाले हैं जिन के चलते सरकारों का आना-जाना लगा रहता है।
देश के कुल कालाधन का 90 प्रतिशत पहले ही विदेशों में जमा है। कुछ बड़े व्यापारी देश छोड़कर भाग गये है जिनपर हजारों करोड़ की देनदारी है। राज्य का लोक कल्याणकारी कार्य ठप है। उदारीकरण से शुरू अर्थव्यवस्था का परिर्वतनवादी प्रयोग भूंमण्डलीकरण की गिरफ्त में है। बड़े औद्योगिक घरानों और अंतर्राष्ट्रीय कार्पोरेशन अधिकतम लाभ लेकर अपनी जेब भर रहे हैं। बेहाल है तो आम लोग जो मुश्किल से अपनी दाल, रोटी जुटा पा रहे हैं। देश की 90 प्रतिशत आबादी रोटी, कपड़ा व मकान के सपनों को पूरा करने के दौरान जन्म से मृत्यु का सफर पूरा कर लेती है। गरीब और अमीर के बीच का फासला बढ़ता जा रहा है। यह क्या रूप लेगा अभी से अनुमान लगाना कठिन है।

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