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पितृपक्ष 25 सितंबर से 8 अक्टूबर तक, पितरों को देते हैं जल : पंडित प्रसाद दीक्षित

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पंडित प्रसाद दीक्षित
धर्म, कर्मकांड एवं ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ
-पचांग: महालया से पितृ विसर्जन अमावस्या तक
-पितृपक्ष में श्राद्ध से जीवन में सुख-शान्ति, समृद्धि मिलती है
वाराणसी। पितृपक्ष जिसमें हम अपने पितरों को जल अर्पित कर पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। आश्विन मास कृष्ण पक्ष के 15 दिन पितृपक्ष के नाम से जाने जाते हैं। इन 15 दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। पितृपक्ष श्राद्ध के लिए निश्चित 15 तिथियों का एक समूह है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए। पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने की विधि है। इसी दिन से महालया का प्रारंभ भी माना जाता है।

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श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ किया जाए। पितृपक्ष में ऐसा करने से पितृगण वर्ष भर तक प्रसन्न रहते हैं। प्रतिपक्ष में श्राद्ध मुख्य तिथियों को ही होते हैं किंतु तर्पण प्रतिदिन किया जाता है। देवताओं को जल देने के अनंतर पितरों को जल देकर तृप्त किया जाता है। यद्यपि प्रत्येक अमावस्या पितरों की पुण्यतिथि है तथापि आश्विन की अमावस्या पितरों के लिए परम फलदाई है। इसी प्रकार नवमी को माता के श्राद्ध के लिए पुण्यदाई माना गया है। श्राद्ध के लिए सबसे पवित्र स्थान गया तीर्थ है। जिस प्रकार पितरों की मुक्ति गया को परम पूज्य माना गया है, उसी प्रकार माता के लिए काठियावाड़ का सिद्धपुर स्थान परम फलदाई माना गया है। इस पुण्य क्षेत्र में माता का श्राद्ध करके पुत्र अपने मां से सदा सर्वदा के लिए मुक्त हो जाता है। यह स्थान ‘‘मातृगया‘‘ के नाम से भी प्रसिद्ध है।

पितृपक्ष में श्राद्ध की महिमा धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों को पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख साधन तथा धन इत्यादि की प्राप्ति करता है। यही नहीं पितरों की कृपा से ही उसे सब प्रकार की समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। आश्विन मास की पितृपक्ष में पितरों को आशा लगी रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिंडदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे स यही आशा लेकर वे पृथ्वी लोक आते हैं
। अतः प्रत्येक हिंदू सद्गृहस्थ का धर्म है कि वह पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध एवं तर्पण अवश्य करें तथा अपनी शक्ति के अनुसार फल मूल जो भी संभव हो सके पितरों के निमित्त दे। पितृपक्ष पितरों के लिए पर्व का समय है। अतः इस पक्ष में श्राद्ध किया जाता है।
महालया (पितृ विसर्जन अमावस्या)-
अश्विन अमावस्या को पितृ विसर्जन अमावस्या करते हैं। जो व्यक्ति पितृपक्ष के 15 दिनों तक श्राद्ध नहीं करते हैं, अमावस्या को ही अपने पितरों के श्राद्ध इत्यादि संपन्न करते हैं। जिनकी याद नहीं हो उनके श्राद्ध-तर्पण-दान आदि इसी अमावस्या को किया जाता है। आज के दिन सभी पितरों का विसर्जन होता है। अमावस्या के दिन अर्थात महालया के दिन पिता अपने पुत्र के द्वार पर पिंडदान एवं श्राद्ध आदि की आशा में आते हैं। यदि वहां उन्हें पिंडदान या तिलांजलि आज नहीं मिलती है तो शॉप देकर चले जाते हैं। अतः आज के दिन पितरों को अवश्य संतुष्ट करें।

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