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भौम प्रदोष व्रत से धन-धान्य, पुत्र सुख, सौभाग्य की प्राप्ति होती है: पं. प्रसाद दीक्षित

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पण्डित प्रसाद दीक्षित
विशेषज्ञ-धर्म-कर्म-ज्योतिष
न्यासी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी
-मंगलवार 10 जुलाई को है भौम प्रदोष व्रत
-सोमवार 9 जुलाई से 15 जुलाई 2018 तक का पंचांग
-13 जुलाई 2018 को खंड सूर्य ग्रहण
वाराणसी। मंगलवार भौम प्रदोष व्रत से जीवन में धन-धान्य, पुत्र सुख, सौभाग्य की प्राप्ति होती है। प्रभु की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जीवन का व्रत संपन्न होना अत्यंत आवश्यक है। व्रतों की श्रृंखला में भगवान शिव के लिए प्रदोष व्रत रखने का विधान भी बताया गया है। इस संसार में शिवस्मरण ही सार स्वरूप है। संसार चक्र में भोगी जाने वाली बहुविध व्यवस्था और अंतक के कठोरतम प्रहारों को नष्ट कर देने का एकमात्र साधन यही है। दान एवं रण में अप्रतिम मंगलमूर्ति आशुतोष भगवान शिव के प्रीती विधायक व्रतों में प्रदोष व्रत की महिमा का वर्णन किया गया है। शिव आराधना के क्रम में प्रदोष को परम पवित्र माना गया है। दिवसावसान और रात समागम के मध्य का समय प्रदोष काल है। प्रदोषकालीन व्रत अनुष्ठान होने के कारण इसका नाम प्रदोष व्रत पड़ा।

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प्रदोष व्रत का अनुष्ठान त्रयोदशी तिथि को होता हैै। इस व्रत का निष्ठापूर्वक आचरण करने से निर्धन धनवान, मूर्ख विद्वान, पुत्रहीन पुत्रवान हो जाते हैं। भाग्यहीना बालिकाएं सुलक्षणवती, विधवाएं धर्मवती और सुहागिनें अखंड सौभाग्यवती हो जाती हैं। शास्त्रों में इस व्रत की बड़ी महिमा गाई गई है तथा लोकमानस में इसके प्रति आस्था बद्धमूल है। स्कंदपुराण के अनुसार जो लोग प्रदोष काल में अनन्य भक्ति पूर्वक भगवान सदाशिव की पूजा करते हैं, उन्हें धन-धान्य, पुत्र सुख, सौभाग्य की प्राप्ति और नित्य वृद्धि होती है। ऐसी मान्यता है कि समस्त देवतागण इस काल में भगवान शंकर के पूजन के निमित्त कैलाश शिखर पर पधारते हैं। भगवती सरस्वती वीणा बजा कर, इंद्र वंशी धारण कर, ब्रह्मा ताल देकर, महालक्ष्मी सुंदर गाना गाकर, भगवान विष्णु गंभीर मृदंग बजाकर अवस्थित रहते हैं एवं भगवान शिव की सेवा करते रहते हैं और गंधर्व, सूर्य, नाग, सिद्ध, विद्याधर, अप्सरासमूह और भक्त प्रदोष काल में भगवान शिव के पास चले आते हैं।

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प्रदोष व्रत का अनुष्ठान करने वाले साधक को भोजन नहीं करना चाहिए । शाम को स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिए स पूजन स्थल को स्वच्छ जल एवं गोबर से लीप कर वहां मंडप बना लेना चाहिए। उसी स्थान पर पांच रंगों के मिश्रण से पद्मपुष्प की आकृति बनाकर कुश का आसन बिछाकर उस पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठना चाहिए। भगवान शंकर की दिव्य मूर्ति का ध्यान करना चाहिए। ध्यानकाल में एकाग्रचित संकल्प करके भगवान शंकर से निवेदन करना चाहिए कि भगवान आप संपूर्ण पापों के नाश हेतु प्रसन्न हो। शोकरूपी अग्नि में संसार के भय से भयभीत अनेक रोगों से आक्रांत इस अनाथ की रक्षा कीजिए। हे स्वामिन् आप पार्वती के साथ पधारकर मेरी पूजा ग्रहण कीजिए। मंत्र से भगवान शिव और पार्वती का आवाहन करना चाहिए। खाद्य दान आदि के पश्चात पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराना चाहिए। तत्पश्चात वस्त्र, यगोपवित, गंधद्रव्य और आभूषण आदि अर्पित करना चाहिए। पुष्पों में मंदार, कमल, कनेर, धतूरा और बिल्व पत्र समर्पित किए जाने चाहिए । तत्पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य निवेदित कर तांबूल आरती करनी चाहिए। अंत में पंचाक्षर मंत्र श्नमः शिवायश् का जप करना चाहिए। पूजा की समाप्ति के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए।
बुधवार अमावस्या – अमावस्या तिथि को स्नान- दान- श्राद्ध करने का विशेष महत्व होता है। जो लोग अपने पितरों को प्रसन्न करना चाहें वह आज के दिन उनके निमित्त सविधि कर्मकांड द्वारा निदान करें तो सर्वाधिक लाभ प्राप्त होगा।

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शुक्रवार, सूर्य ग्रहण- दिनांक 13 जुलाई 2018 को खंड सूर्य ग्रहण लग रहा है। यह भारत में दृश्य नहीं है। यह ऑस्ट्रेलिया की सुदूर दक्षिणी भाग के अल्प क्षेत्रों में दिखाई देगा। सूर्य ग्रहण भारतीय समय अनुसार सुबह 7.18 से प्रारंभ होगा। इसका मध्यकाल सुबह 8.31 पर तथा इसकी समाप्ति दिन में 9.43 पर होगा।
सोमवार 9 जुलाई से 15 जुलाई 2018 तक का पंचांग
जुलाई 2018, आषाढ़ कृष्ण शुक्ल पक्ष, शक 1940
विक्रम संवत 2075
सोमवार 9 जुलाई- आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि दिन में 5.04 तक, योगिनी एकादशी व्रत
मंगलवार 10 जुलाई- आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि दिन में 3.20 तक, भौम प्रदोष व्रत
बुधवार 11 जुलाई- आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि दिन में 1.16 तक, भद्रा दिन में 1.16 से रात्रि 12.08 तक
गुरुवार 12 जुलाई- आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि दिन में 11.01 तक
शुक्रवार 13 जुलाई – आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि दिन में 8.30 तक, खंड सूर्यग्रहण
शनिवार 14 जुलाई – आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि दिन में 6.07 तक, तदुपरांत द्वितीया तिथि प्रारंभ, रथयात्रा का मेला प्रारंभ
रविवार 15 जुलाई – आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि रात्रि 1.17 तक

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