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प्रेम व करूणा से ही विश्व में शान्ति संभव

 

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-सर्वधर्म सभा में दिया विश्व में शान्ति स्थापित करने पर जोर
वाराणसी। सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुधाकर मिश्र ने कहा कि विनय एक रहस्यमय शब्द है। इसके मर्म को समझना आवश्यक है। जितेन्द्रीय व्यक्ति सदैव विनयी होता है क्योकि जो व्यक्ति जितेन्द्रत्व को प्राप्त नहीं करता हैं, वह धर्म के मर्म को नहीं समझ सकता है। उन्होंने कहा कि बिना अध्यात्म ज्ञान के भी धर्म के महत्व को नहीं समझा जा सकता है। सांस्कारिक जीवन में सुख-शान्ति के लिए मनुष्य को अध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता होती है ।
भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली सारनाथ में मूलगंध कुटी विहार की 85 वीं वर्षगाठ पर आयोजित सर्वधर्म सभा में मुख्य अतिथि के पद से सम्बोधित करते हुए प्रो. मिश्र ने कहा कि धन साधन हो सकता है लेकिन श्रद्धा नहीं हो सकता है। धर्म के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती है। हर धर्म का उद्देश्य शान्ति की स्थापना करना होता है। बीएचयू के जैन बौद्ध दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार जैन ने कहा कि धर्म वहीं है जो सुई का कार्य करें, कैची का कार्य नहीं करें। धर्म मनुष्य को समभाव, उत्कर्ष की ओर, जीवन में धैर्य व शान्ति स्थापित करती है। जैन धर्म में व्यक्ति की नहीं व्यक्तित्व की पूजा होती है। शान्ति के प्रयास के लिए उस दृष्टि की आवश्यकता होती है जो समता मूलक हो। शान्ति बाहर की वस्तु नहीं वह आन्तरिक वस्तु है। अज्ञानता को दूर करने कलिए सम्यक ज्ञान की आवश्कता होती है। जब तक विनय नहीं आता है तब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती है। मैत्री भवन के फादर चन्द्रकान्त ने कहा कि सर्वत्र दुख ही दुख है। आज पूरा विश्व अशान्त है। यह आज के समय का सबसे दुखद पहलू है। इसका निराकण दो चीजों से ही संभव है। वह है प्रेम व करूणा। जिससे विश्व में सुख-शान्ति स्थापित हो सकता है। ईसाई धर्म का सार जहां प्रेम है वहीं बौद्ध धर्म का सार करूणा है। अविद्या का नाश होने के बाद ही विद्या का उद्भव होता है। बीएचयू के उर्दू विभाग के प्रो याकूब खान ने कहा कि दुनिया में तमाम धर्म का उद्देश्य एक ही है यह बात और है कि बुनियादी तौर पर, अलग-अलग परिवेश में होने के कारण कुछ भिन्न है। कोई भी काम तीन चीजों से आगे बढ़ता है। पहला लालच के चलते, दूसरा डर के कारण व तीसरा मोहब्बत के कारण। लेकिन धर्म जिसकों अहमियत देता हैं वह है मुहब्बत। लेकिन आज धर्म का प्रचार प्रसार डर व लालच के कारण हो रहा हैं। जिससे आज विश्व में अराजकता का माहौल है। गुरू द्वारा के धर्मवीर सिहं ने कहा कि धर्म वहीं है जो निर्मल कर्म करें। दया की भावना नहीं है तो वह धर्म नहीं हो सकता है। सबको यह पता चलना चाहिए कि हम सब एक कुदरत के बन्दे है। जलाना है तो पड़ोसी के घर के चूल्हे को जलाओं। आपसी प्रेम व सद्भाव ही धर्म है।
उक्त अवसर पर केन्दीय तिब्बती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एलएन शास़़्त्री, प्रो संघसेन सिंह आदि वक्ताओं ने भी सम्बोधित किया। स्वागत महाबोधि सोसायटी आॅफ इण्डिया के महासचिव भन्ते पी सिबली थेरो ने किया। संचालन जहां महाबोधि इण्टर कालेज के प्राचार्य डाॅ बेनी माधव ने किया वहीं धन्यवाद ज्ञापन महाबोधि विद्या परिषद के अध्यक्ष प्रो. राम मोहन पाठक ने किया। इस दौरान जीवन ज्योति नेत्र विद्यालय की छात्राओं व महाबोधि इन्टर कालेज के छात्राओं द्धारा भगवान बुद्ध के जीवन पर नृत्य नाटिका प्रस्तुत की गयी।

 

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