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प्रो. कृष्णनाथ जी मानवीय मूल्यों के पुंज थे: जितेन्द्र मिश्र

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-विजय श्रीवास्तव
-काशी विद्यापीठ में प्रो. कृष्णनाथ जी की तीसरी पुण्यतिथि पर आयोजित हुआ संवाद कार्यक्रम
-उनके पांडुलिपि को संग्रहित कर प्रकाशित करने का संकल्प
वाराणसी। प्रो. कृष्णनाथ एक अर्थशास्त्री, समाजवादी चिंतक, लेखक और विचारक ही नहीं वरन् मानवीय मूल्यों के पुंज थे। उनका पूरा जीवन ही मानवीय मूल्यों की समृद्ध विरासत के रूप में जाना जायेगा। उनकी लेखन शैली, जीवन शैली, सरल व्यक्तित्व, समाज के प्रति सोच लोंगो को बरबस ही प्रभावित करती थी। उनकी सबसे बडी विशेषता थी कि वे जहां एक अच्छे वक्ता थे तो वहीं एक अच्छे श्रोता भी थे। आज उनके धरोंहर को केवल सजोने व संरक्षण ही करने की जरूरत नहीं वरन् उन्हें जन-जन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी हम लोंगो की है। जिससे उनके विचारों से समाज को एक नयी दिशा मिल सके।

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उक्त बातें महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के केन्द्रीय पुस्तकालय के सभागार में आयोजित प्रोफेसर कृष्णनाथ की तीसरी पुण्यतिथि पर संवाद कार्यक्रम  में मुख्य अतिथि के पद से सम्बोधित करते हुए साहित्यकार जितेन्द्र मिश्र ने कही। उक्त अवसर पर विधान परिषद सदस्य शतरूद्ध प्रकाश ने कहा कि प्रो कृष्णनाथ जी आजादी की लडाई के एक प्रतीक थे। सामाजिक आन्दोलनों व अपने लेखनी की माध्यम से उन्होंने समाज को दिशा देने का काम किया। उनका मानना था कि आकाश के नीचे कुछ नया नहीं है, नया है तो केवल सोच। जिससे हम एक बदलाव ला सकते हैं। इस दौरान काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनील उपाध्याय ने कहा कि आज वैचारिक सुन्दरता का युग चल रहा है। आज जीवन दर्शन कोई माने नहीं रह गया है। आज की युवा पीढी पैकेज के पीछे भाग रही है। उसे सामाजिक मूल्यों, जीवन दर्शन से कुछ लेना देना नहीं है। यह हमारे सामने सबसे बडी चुनौती है। जिसको लेकर प्रो. कृष्णनाथ सदेैव चिन्तित रहते थे। वैचारिक शून्यता के इस युग में चाहे वह अघ्यापक हो या नेता उसे अध्ययन, ज्ञान से अधिक गाडी, बंगला, बैंक बैलेंस का अधिक ध्यान है। इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो राजीव द्धिवेदी ने कहा कि प्रो कृष्णनाथ जी सरल व्यक्तित्व के इंसान थे। उनका जीवन शैली अदभुत था। वरिष्ठ पत्रकार योगेन्द्र नारायण शर्मा ने कहा कि प्रो. कृष्णनाथ जी के जीवन के हर पृष्ठों पर नजर डालने की जरूरत है। उनकी साधना, उनकी हिमालय यात्रा सहित अन्य विन्दुओं पर चर्चा करने की आवश्यकता है। उनकी यात्रा एक चेतन यात्रा थी। लगतार आगे बढने वाली यात्रा थी।

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प्रदेश की समाज कल्याण विभाग की पूर्व अध्यक्षा व प्रो. कृष्णनाथ जी की भतीजी अंजना प्रकाश ने कहा कि किसी भी परिवार व समाज को बनाने में सामाजिक मूल्यों की आवश्यकता होती है। जब हम उन मूल्यों को सही ढंग से सजोते हैं तो वह आदर्श व समाज के लिए अनुकरणीय बन जाता है। आज एक व्यक्ति व्यक्ति के तौर पर व सामाजिक रूप से कैसे रहता है यह एक बडी चुनौती है। प्रो. कृष्णनाथ जी बेहद ही संकोची प्रवृत्ति के थे, अधिकतर वे अनुभवों को साझा नहीं करते थे। जिससे उनकी सामाजिक मूल्यों प्रति सोच व नजरिया बहुत कुछ हमारें सामने नहीं है। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजली तभी होगी जब हम उनके मानवीय मूल्यों को समाज के सामने लाये और उसपर चलने का प्रयास करें। वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि प्रो. कृष्णनाथ जी मानते थे कि जब एक आदर्श बोध को हम जीवन में उतारते हैं तो जीवन सार्थक हो जाता है।

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इस अवसर पर प्रो. कृष्णनाथ के भजीजे  डॉक्टर आलोक कुमार ने कहा कि कृष्णनाथ जी ने अपने लेखन के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया। हिमालय में उन्होंने काफी लंबे वक्त तक यात्रा की। उन्होंने जनजातियों से लेकर सामाजिक सांस्कृतिक संबंधों पर भी  प्रकाश डाला। आज हमसब की जिम्मेदारी बनती हैं कि उनके अप्रकाशित पांडुलिपियों को किया प्रकाशित कर समाज के सामने लाया जाए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी विद्यापीठ अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर प्रदीप कुमार ने कहा कि कृष्णनाथ समाजवादी चिंतक ही नहीं बल्कि बौद्ध दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान भी थे। वे आदर्श शिक्षक तो थे ही अपने जीवन मूल्यों को सजो कर रखते थें। जीवन के अन्तिम समय में उनका बौद्ध दर्शन के प्रति लगाव उनके मैत्री व करूणा के प्रति स्वभाव के चलते ही हुआ। जिसके वे प्रतिमूर्ति थे।
संवाद कार्यक्रम का संचालन विद्यापीठ के प्रो. उदयी चाौबे ने किया। इस दौरान डाॅ संजय पाण्डेय, जय सिंह, कंचना सिंह, विपिन राय, राजेन्द्र कुमार, संजय कुमार आदि लोग उपस्थित रहे।

 

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