बुद्ध केवल धर्म नहीं वरन् एक जीवन शैली: प्रो राम मोहन पाठक

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-”महान संचारक: बुद्ध और उनके संदेश” विषयक सेमीनार संपन्न
वाराणसी। विचार के क्षेत्र में बुद्ध को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है। भगवान बुद्ध ने भाषा में दिव्यता का निषेध किया है। बुद्ध ने भाषा में दिव्यता कैसे जायी जाये, इस पर विशेष जोर दिया। सन्दर्भ, परिवेश, आत्मचिन्तन और अर्थ से न सिर्फ प्रभावशाली संचार होता है, बल्कि जन-मानस में बोध तत्व का भी विकास होता है।
उक्त बातेें आज नवभारत टाइम्स (विचार) के सम्पादक चन्द्र भूषण ने सारनाथ में आयोजित महाबोधि सोसायटी आॅफ इण्डिया द्धारा तीन दिवसीय ”महान संचारक: बुद्ध और उनके संदेश”  विषयक अन्तर्राष्टीय सेमीनार के मुख्य अथिति के पद से सम्बोधित करते हुए कहा। इस दौरान मुख्य वक्ता के पद से सम्बोधित करते हुए बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय पटना में मीडिया स्टडीज विभाग के असिस्टेण्ट प्रोफेसर डाॅ किशुक पाठक ने बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्यों की व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान बुद्ध ने अपने संदेशों में अति सामान्य भाषा का चयन किया। जिससे आम-जन का सीधा जुड़ाव बुद्ध के उपदेशों से सभंव हो सका।

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उक्त अवसर पर महाबोधि विद्या परिषद के अध्यक्ष प्रो राम मोहन पाठक ने कहा कि बुद्ध स्वयमेव एक जीवन शैली हैं। आज भारत के प्रधानमंत्री भी युद्ध नहीं बुद्ध चाहिए की नीति का वैश्विक स्तर पर प्रचार कर रहे हैं। मौन के महत्व को रेखांकिंत करते हुए प्रो. पाठक ने कहा कि मौन के बाद संचारकर्ता स्र्वकालिक महत्व को प्राप्त करता है, यही नहीं बौद्ध धर्म की विशेषता भी हैं। हरिश्चन्द्र पी जी कालेज के असिंस्टेंट प्रोफेसर डाॅ परमात्मा कुमार मिश्र ने बुद्ध को संज्ञानात्क अवधारणा प्रदान करने वाला पहला संचारकर्ता बताया। उन्होंने जनमानस से बुद्ध के संदेशों को  जोड़ते हुए बताया कि लोकोक्तियों, मुहावरों के प्रयोग से बुद्ध के संदेश खास प्रासंगिक हो सके।
अध्यक्षता करते हुए बौद्ध विद्धान प्रों. महेन्द्र जी ने बुद्ध को आर्यमौन को समकालीन सन्दर्भ में अति प्रांसगिक बताते हुए कहा कि बुद्ध को पता था कि किसके बीच कौन सी बातें कहनी है इसी कारण से उन्हें कभी भी अपनी बातों को वापस नहीं लेना पड़ा और नहीं किसी ने कभी बुद्ध के किसी विचार का खण्डन किया।
उक्त अवसर पर प्रो. संघसेन सिंह, डाॅ उल्लवल पाण्डेय, डाॅ मिथलेश कुमार द्विवेदी, डाॅ ओम प्रकाश त्रिपाठी आदि लोगों ने भी अपने विचार रखे। इस अवसर पर जहां स्वागत बीएचयू के प्रो विमलेन्द्र कुमार ने किया वहीं सचांलन महाबोधि इन्टर कालेज के प्राचार्य डाॅ बेनी माधव व धन्यवाद ज्ञापन डाॅ रमेश ने किया। इस अवसर पर महाबोधि सोसायटी आॅफ इण्डिया के महासचिव भन्ते पी सिबली थेरो ने अतिथियों को स्वागत शाल व स्मृति चिन्ह प्रदान कर किया।

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