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बेसिक शिक्षा : आॅफलाइन के माध्यम से होगा अब समायोजन का खेल !

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(संजय कुमार श्रीवास्तव)
-देरी का बहाना बना कर सरकार ने अब आॅनलाइन समायोजन न कर आॅफलाइन का लिया निर्णय
-महिला अध्यापकों की नियुक्ति 20 से 30 किमी की दूरी पर
-कई विद्यालयों में 5 से 10 वर्षो तक से पड़े है अध्यापक
-जबकि वहीं अधिकतर अध्यापकों को एक-दो वर्षो में ही कर दिया जाता है इधर से उधर
            वाराणसी। एक ओर केन्द्र व प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार रोकने के लिए हर काम को आनलाइन कर रही है। जिससे विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को पूरी तरह से रोका जा सके लेकिन वहीं शिक्षा विभाग अपने काम को अब आॅनलाइन न कर आॅफलाइन करने पर जोर दे रही है। शिक्षा विभाग ने अब शिक्षकों के समायोजन को आनॅलाइन न कर के आफॅलाइन करने का निर्णय लिया है। तर्क यह है कि आनॅलाइन प्रक्रिया में देरी के कारण आफॅ लाइन का निर्णय लिया गया है। कारण साफ है कि आनॅलाइन प्रक्रिया में शिक्षा विभाग के आलाअधिकारियों से लेकर विभाग में डीह बाबा बने बाबूओं के हाथों को बांध कर रख दिया था। जिससे प्रतिवर्ष समायोजन के नाम होने वाला खेल नहीं हो पाता। इस लिए देरी का बहाना बना कर आॅनलाइन से आॅफलाइन कर दिया गया जिससे समायोजन के नाम पर खेल निर्वाध रूप से चलता रहे।

            गौरतलब है कि विभाग ने जारी अपने नये आदेश के तहत कहा है कि  बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षकों का समायोजन 18 जुलाई तक किया जायेगा। बेसिक शिक्षा अधिकारियों की लापरवाही के कारण समायोजन के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया में हो रही देरी के कारण सरकार ने ऑफलाइन समायोजन के निर्देश दिए हैं। सचिव संजय सिन्हा ने मंगलवार को सभी बीएसए को पत्र जारी कर 30 अप्रैल को जनपद में निर्धारित पद के अनुरूप समायोजन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति समायोजन की प्रक्रिया पूरी करेगी। समायोजन में इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि कोई भी स्कूल एकल या बंद न होने पाए। समायोजन पूरा होने के बाद जिले के अंदर खाली पदों पर ट्रांसफर की कार्रवाई होगी। सबसे अंत में अंतर-जनपदीय तबादला किया जाएगा। प्रश्न यह उठता है कि आखिर आनॅलाइन प्रक्रिया के तहत समायोजन में क्यों देरी गयी। क्या इसके पीछे प्रदेश के बेसिक शिक्षा अधिकारियों की मंशा सरकार को समझ में नहीं आती है। एक ओर सरकार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश के शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार ने पूरे विद्यालय व उसके शिक्षा प्रणाली पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आज शिक्षा विभाग में बाबूओं की सरकार चल रही है। 5 से 10 वर्षो से एक ही स्थान पर जमंे ये बाबू समायोजन से लेकर हर व्यवस्था को चला रहे है। चाहे वह ज्वाइनिंग करने की बात हो, मनमाफिक स्थान पर स्थानान्तरण की बाते हो, चाहे वह चुनाव में डयूटी कटवाने की बात हो हर बात का रेट फिक्स है। उसके बिना यहंा कुछ नहीं होता है। समायोजन में पहुच व पैसा सर पर चढ़ कर बोलता है। अधिकतर समायोजन व स्थान्तरण उन्हीं का होता है। जो इन दोंनो चीजों से कमजोर होते हेेैं। समायोजन में उन्हीें को हटाया जाता है। जो बाद में आता है। पहले से जमे 5 से 10 से अध्यापकों को नहीं हटाया जाता है। बाद में आये अध्यापकों को ही बार-बार इधर-उधर किया जाता है। जिससे वह थकहार कर इन बाबूओं के शरण में आ जाये। आज वाराणसी के कई ऐसे स्कूल है जिसमें कई अध्यापक 5 साल से अधिक वर्षो से पड़े है। जबकि कई ऐसे अध्यापक है जो हर एक-दो वर्षो में ही हटा दिया जाता है।  
                भ्रष्टाचारमुक्त समायोजन की राह में रोड़ा आज शिक्षा विभाग के आलाअधिकारी से लेकर कर्मचारी बने हुए है। पहले ऑनलाइन समायोजन की तैयारी थी। इसके लिए सभी बीएसए से शिक्षकों का सैलरी डाटा अपलोड करने को कहा गया था लेकिन कई बीएसए ने सैलरी डाटा अपलोड नहीं किया। कई के डाटा में तमाम त्रुटियां थी। इसके कारण समायोजन की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही थी। सूत्रों के अनुसार तमाम बीएसए ऑनलाइन समायोजन नहीं होने देना चाहते थे क्योंकि तब वे अपनी मनमानी नहीं कर पाते। यही कारण था कि सैलरी डाटा देने में रुचि नहीं ले रहे थे। अब जबकि ऑफलाइन प्रक्रिया को मंजूरी मिल गई है तो अब शिक्षा विभाग के बाबू से लेकर आलाअधिकारी व बीएसए अपनी मनमानी कर सकेंगे। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अब जब जुलाई से स्कूलों में पढ़ाई शुरू होनी चाहिए वहीं अब अध्यापक पढ़ाई छोड़कर अपने मनमाफिक स्थानों पर नियुक्ति के लिए लग गये है। जिससे स्कूलों में शिक्षा बाधित हो रही है। यह काम अगर 20 मई से 30 जून के बीच में कर दिया जाता तो कम से कम बच्चों की शिक्षा प्रभावित नहीं होती।

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