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भारतीय राजनीति की अनकही कहानी: ‘थैंक्स फॉर 90 वोट्स’’: इरोम शर्मिला

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-विजय श्रीवास्तव
– चुनाव में इरोम को केवल 90 वोट मिले
-इरोम ने चार शब्दों में लिखा लोकतंत्र का शोकगीत
-‘पीपुल्स रिइंसर्जेंस एंड जस्टिस अलाएंस’ नाम की पार्टी बनाकर लड़ा था चुनाव
वाराणसी। लोग कहते है कि राजनीति किसी की नहीं होती। उसे इतिहास-भूगोल से कोई लेना-देना नहीं होता। राजनीति में समय के रूख को भापने की कला, सही रणनीति व माकेर्टिंग की आवश्कता होती है। अगर आप इस कला में माहिर हंै तो किसी परिस्थिति को अपने वश में कर सकते हैं। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं। जो इन बातों की बड़ी संजीदगी से समर्थन करती दिखती है। इस बार के चुनाव में  इसी तरह की मानवता के इतिहास में तमाम अनकही करुण कहानियों के अध्याय में एक और कहानी जुड़ गयी है।  मणिपुर की इरोम शर्मिला का अपनी करारी हार के लिए जनता को इन चार शब्दों  ‘थैंक्स फॉर 90 वोट्स’’ में धन्यवाद देना वैसी ही एक अनकही कहानी है जो भारतीय राजनीति के अध्याय में एक काले अध्याय के रूप में लिखी जायेगी।
मणिपुर में अफ्स्पा को लेकर 16 वर्षों तक अनशन करने वाली इरोम शर्मिला की चुनाव में इतनी करारी हार शायद हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। मणिपुर में मनोरमा कांड में न्याय पाने के लिए नग्न होकर प्रदर्शन करने वाली महिलाएं हार गई थीं, जिसको लेकर इरोम शर्मिला ने 16 वर्ष तक अनशन किया था। अपनी आवाज को और बुलंद करने के लिए उसने पार्टी बना कर चुनाव में उतरने का फैसला इस बार किया था लेकिन देश की आधी आबादी के लिए अपने जीवन के 16 स्वर्णिम वर्ष गवाने वाली इरोम को चुनाव में केवल 90 वोट मिलंेंगे इसकी उसे सपने में भी कल्पना नहीं थी। जबकि उसके अनशन में बराबर सैकड़ो की भीड़ रहती थी। उसके आन्दोलन को महिलाओं ने भी बढ़चढ़ कर समर्थन दिया था लेकिन चुनाव में उसे उन्हीं महिलाओं ने पूरी तरह से खारिज कर दिया जिसके लिए वह लड़ती रही। इस हार से बुरी तरह आहत इरोम ने फेसबुक पर जो चार शब्दों में अपनी बात को लिखा वह मानवता के लिए सोचनीय है। उसने फेसबुक पर “थैंक्स फॉर 90 वोट्स“ लिख कर राजनीति को अलविदा करने की घोषणा कर दी है लेकिन उसने अपनी लड़ाई को अनवरत जारी रखने की घोषणा की है। .
पांच राज्यों में जिस तरह चुनाव में नोटबंदी में मरे करीब 150 लोग कोई मुद्दा नहीं थे, जिस तरह उत्तर प्रदेश में कुपोषित आधी महिलाएं कोई मुद्दा नहीं थीं, जिस तरह डायरिया या इनसेफलाइटिस से मरने वाले लाखों बच्चे कोई मुद्दा नहीं होते, उसी तरह इरोम का 16 साल तक संघर्ष करके अपना जीवन दे देना भी कम से कम मणिपुर विधानसभा में कोई मुद्दा नहीं रहा। जिस लोकतंत्र में अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी पत्नी की हत्या के केस में जेल में बंद रहकर चुनाव जीत जाते हों, बाहुबली माफिया मुख््तार अंसारी जेल में रहकर चुनाव जीत जाते हों, बाहुबली सुशील कुमार, रघुराज प्रताप सिंह और विजय मिश्र आदि चुनाव जीत जाते हों, वहां पर हत्याओं के विरोध में जिंदगी खपा देने वाली इरोम की हार तो जैसे पहले से ही तय थी। तमाम बाहुबलियों को भारी बहुमत से जिता देने वाली जनता ने आंसुओं से गीली आंखों वाला, नाक में नली डाले एक कवयित्री का चेहरा पसंद नहीं किया।
इरोम ने 16 साल बाद अपना अनशन तोड़ा था और चुनावी राजनीति में उतरकर बदलाव लाने का फैसला किया था। उन्होंने ‘पीपुल्स रिइंसर्जेंस एंड जस्टिस अलाएंस’ नाम की पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन मणिपुर के मतदाताओं ने इरोम को नोटा का विकल्प समझना भी मुनासिब नहीं समझा। उन्हें मात्र 90 वोट मिले. चुनाव परिणाम आने के बाद इरोम रोईं और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर डाली। रविवार को इरोम ने अपने फेसबुक पेज पर चार शब्द का स्टेटस लिखा, ‘थैंक्स फॉर 90 वोट्स’ ।
इरोम के स्टेटस पर तमाम लोगों ने हमदर्दी भरे कमेंट किए हैं। गनीमत है कि उन्हें ट्रोल नहीं किया गया। शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फेसबुक पेज पर यह स्टेटस शेयर करते हुए लिखा, ‘इरोम शर्मिला का ये स्टेटस पढ़ रहा हूं और रोयां-रोयां कांप रहा है। कितनी हिम्मत जुटाई होगी उन उंगलियों ने ‘थैंक्स फॉर 90 वोट्स’’ टाइप करने के लिए! मणिपुर के लोगों के लिए 16 साल का अनशन और तोहफे में 90 वोट! वाह रे लोकतंत्र!’ अदिति ने अपनी वॉल पर लिखा, ‘इरोम ने जनता को धन्यवाद नहीं दिया है, चार शब्दों में लोकतंत्र का शोकगीत लिखा है।’ एके मिश्रा ने लिखा, ‘इरोम शर्मिला का 90 वोट पाना और राजा भैया का 1,30,000 वोट पाना ही लोकतंत्र है. सलाम जनादेश!’
चुनाव हारने के बाद इरोम ने बयान दिया, ‘मैं इस राजनीतिक प्रणाली से आजिज आ चुकी हूं। मैंने सक्रिय राजनीति छोड़ने का फैसला लिया है। मैं दक्षिण भारत चली जाउंगी क्योंकि मुझे मानसिक शांति चाहिए। लेकिन मैं आफस्पा के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखूंगी, जबतक वह हटा ना लिया जाए, लेकिन मैं सामाजिक कार्यकर्ता की भांति लड़ती रहूंगी।’

’यानी इरोम फिर उसी अनशन की अंधी गली में लौट जाएगी, जिसमें घुप्प अंधेरा है, डरावना सन्नाटा है और इरोम अकेली है’

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