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मंगल के प्रभाव से इस वर्ष भारत सहित संपूर्ण विश्व में रहेगी उथल-पुथल, मंगलवार से नव संवत्सर 2078( हिंदू नव वर्ष ) का आरम्भ

पंडित प्रसाद दीक्षित
ज्योतिषाचार्य एवं पूर्व न्यास परिषद सदस्य ( ट्रस्टी )
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी
-नव संवत्सर का राजा मंगल, मंत्री मंगल, धनेश शुक्र और फलेश चंद्रमा है
-नवरात्र में आद्याशक्ति भगवती दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है
-कलश स्थापन प्रातःकाल 8.45 तक कर लेना चाहिए, इसके बाद द्वितीया तिथि लग जाएगी

वाराणसी। चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि से नव संवत्सर का आरंभ होता है। यह पवित्र तिथि है। आज से पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण आरंभ किया था। युग में प्रथम युग ‘‘सत्ययुग‘‘ का प्रारंभ इसी तिथि को हुआ था। यह तिथि ऐतिहासिक महत्व की भी है, आज के दिन सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी और उसे चिरस्थाई बनाने के लिए विक्रम संवत का प्रारंभ किया था। आज के दिन प्रातः नित्य कर्म करके तिल का उबटन लगाकर स्नान आदि से शुद्ध एवं पवित्र होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर देश काल के उच्चारण के साथ संकल्प करना चाहिए। पूजन के अनंतर विघ्नों के नाश और वर्ष के कल्याण कारक तथा शुभ होने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की जाती है। संकल्प करके नई बनी हुई चैरस चैकी या बालू की वेदी पर स्वच्छ श्वेतवस्त्र बिछाकर उस पर हल्दी केसर के रंगे अक्षर से अष्टदल कमल बनाकर उस पर ब्रह्मा जी की स्वर्णमूर्ति स्थापित करें। गणेश इत्यादि का पूजन के पश्चात ब्रह्मा जी का आवाहन एवं षोडशोपचार पूजन करें। पूजन के अनंतर वर्ष के कल्याणकारक तथा शुभ होने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की जाती है। पूजन के पश्चात विविध प्रकार के उत्तम और सात्विक पदार्थों से ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए।
नव संवत्सर का राजा मंगल, मंत्री मंगल, धनेश शुक्र और फलेश चंद्रमा है। मंगल सेनापति ग्रह है तथा हिंसा का प्रमुख कारक ग्रह माना गया है । मंगल अग्नि तत्व कारक ग्रह माना गया है । मंगल के प्रभाव से इस वर्ष भारत सहित संपूर्ण विश्व में उथल-पुथल की स्थिति बनी रहेगी । राजा एवं सेनापति ग्रह मंगल के कुप्रभाव से वृश्चिक राशि के किसी प्रसिद्ध राजनेता की मृत्यु होना भी अवश्यंभावी है । वृश्चिक राशिवालों को मंगल का निराकरण करना परम आवश्यक है । ऐसा करने से उनके जानमाल की सुरक्षा होना संभव है । इस दिन पंचांग श्रवण किया जाता है । नवीन पंचांग से उस वर्ष के राजा, मंत्री, सेना अध्यक्ष आदिका तथा वर्ष का फल श्रवण करना चाहिए । सामर्थ्य अनुसार पंचांग दान करना चाहिए तथा प्याऊ की स्थापना करनी चाहिए । आज के दिन नया वस्त्र धारण करना चाहिए तथा घर को ध्वज, पताका, बंदनवार आदि से सजाना चाहिए । आज के दिन निंब के कोमल पत्तों, पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिस्त्री और अजवाइन डालकर खाना चाहिए । इससे रुधिर विकार नहीं होता और आरोग्य की प्राप्ति होती है । इस दिन नवरात्र के लिए घट-स्थापन और तिलकव्रत भी किया जाता है । इस व्रत में यथासंभव नदी, सरोवर अथवा घर पर स्नान करके संवत्सर की मूर्ति बनाकर उसका नाम मंत्रों से पूजन करना चाहिए । इसके बाद विद्वान ब्राह्मण का पूजन-अर्चन करना चाहिए ।
नवरात्रि स्थापना व पूजा विधि:-
चैत्र, आषाढ़, आश्विन तथा माघ के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक के 9 दिन नवरात्र कहलाते हैं । इस प्रकार 1 वर्ष में चार नवरात्र होते हैं । इनमें आद्याशक्ति भगवती दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है । यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है । आज के दिन सर्वप्रथम स्वयं स्नान इत्यादि से पवित्र हो पूजा स्थल का लेपनकर उसे पवित्र कर लेना चाहिए । तत्पश्चात घट स्थापन करने की विधि है । कलश स्थापन प्रातःकाल कर लेना चाहिए इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रतिपदा तिथि दिन में 8.45 तक है इसके बाद द्वितीया तिथि लग जाएगी । अभिजीत मुहूर्त दिन में 11.35 से दिन में ही 12.25 तक है । यह नवरात्र व्रत स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं । यदि स्वयं ना कर सके तो पति-पत्नी, पुत्र या ब्राह्मण को प्रतिनिधि बनाकर व्रत पूर्ण कराया जा सकता है । व्रत में उपवास, रात में भोजन करना या एक बार भोजन करना जो बन सके उसे करें । कलश-स्थापन के लिए पवित्र मिट्टी से वेदी का निर्माण करें । फिर उसमें जौ तथा गेहूं बोए तथा उसपर यथाशक्ति मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का कलश स्थापित करें । यदि पूर्ण विधिपूर्वक करना हो तो पंचांग पूजन इत्यादि जरूर करें । इसके बाद कलश पर देवी की मूर्ति स्थापित करें तथा उसका षोडशोपचार पूर्वक पूजन करें स आज के दिन श्री दुर्गा सप्तशती का संपुट अथवा साधारण पाठ भी करने की विधि है । पाठ की पूर्णाहुति के दिन दशांश हवन अथवा दशांश पाठ करना चाहिए । इससे सर्वश्रेष्ठ लाभ प्राप्त होता है ।

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