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विद्युत निजीकरण के विरोध में पहले ही दिन हड़ताल से यूपी में हाहाकार, सरकार की तैयारी धरी की धरी रह गयी, पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी स्थिति बदतर

विजय श्रीवास्तव
-कई शहरों में बत्ती गुल, अलग-अलग जिलों में आज लगभग 25 हजार कर्मचारी विरोध करेंगे प्रदर्शन
-ऊर्जा मंत्री ने निजीकरण का प्रस्ताव वापस लेने की घोषणा की
-यूपीपीसीएल और विद्युत कर्मचारियों के बीच नहीं बनी अभी सहमति
-उत्तर प्रदेश के विद्युत कर्मचारी संगठन संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दूबे ने कहा कि कार्य बहिष्कार जारी रहेगा।

वाराणसी । 5 अक्टूबर से निजीकरण के विरोध में प्रस्तावित प्रदेश के 15 लाख विद्युत कर्मचारियों के विरोध का असर पूरे प्रदेश साफ दिखा। सरकार की तैयारियां सब धरी की धरी रह गयी। दर्जनों शहरों में विद्युत कटौती से लोग बिलबिला गये और शाम होते-होते परेशान जनता सडकों पर आ गयी। यहां तक कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी स्थिति बदतर दिखी। यहां भी प्रशासन के दावें का कोई असर नहीं दिखा और दिन भर लोग बिजली व पेयजल के परेशान दिखें। स्थिति को देखते हुए वैसे शाम तक प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा नेे समिति के पदाधिकारियों की बैठक भी की जिसमें ऊर्जा मंत्री ने निजीकरण का प्रस्ताव वापस लेने की घोषणा की और सहमति पत्र पर हस्ताक्षर भी किए लेकिन सीएमडी अरविन्द कुमार ने हस्ताक्षर नहीं किया। यूपीपीसीएल और विद्युत कर्मचारियों के बीच भी अभी सहमति नहीं बन पाई है। उत्तर प्रदेश के विद्युत कर्मचारी संगठन संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दूबे ने कहा कि कार्य बहिष्कार जारी रहेगा।


गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग के निजीकरण किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में सूबे के 15 लाख से ज्यादा कर्मचारी और अधिकारी हड़ताल पर हैं। सोमवार को विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की सरकार से वार्ता फेल रही, जिसके बाद समिति ने आज प्रदेश में आंदोलन का ऐलान किया है। अलग-अलग जिलों में लगभग 25 हजार कर्मचारी विरोध प्रदर्शन करेंगे। मालूम हो कि ऊर्जा मंत्री के निर्देश के बाद भी यूपीपीसीएल चेयरमैन ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। चेयरमैन ने कहा जब टेंडर की प्रक्रिया और व्यवस्था में सुधार हो जाएगा तब निजीकरण के प्रस्ताव को कैंसिल करेंगे। ऐसे में उत्तर प्रदेश में बिजली संकट गहराने के आसार दिखाई दे रहे हैं।
कर्मचारियों के कार्यबहिष्कार का असर यूपी के कई शहरों में जोरदार देखने को मिल रहा है। वैसे कई शहरों में विद्युत आपूर्ति जारी है, लेकिन कई ऐसे शहर भी हैं जहां पर कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने से पहले बिजली की आपूर्ति बंद कर दी। प्रदेश के देवरिया, आजमगढ़, बाराबंकी, गोरखपुर, मिर्जापुर, मऊ, गाजीपुर, वाराणसी सहित कई जिले और शहर के कई इलाकें अंधेरे में डूबे हुए हैं। चंदौली के दीनदयाल नगर स्थित चंदौसी विद्युत उप केंद्र पर तो हड़ताली कर्मचारियों ने सुबह से ही आपूर्ति बाधित कर ताला जड़ दिया था। यही नहीं यहां ऑफिस की दीवारों पर लिखे गए अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम और मोबाइल नंबर तक मिटा दिए गए ताकि कोई उपभोक्ता या अधिकारी संपर्क ना कर सकें।
पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हाहाकार, चक्काजाम व धरना
जिस वाराणसी जिले के सांसद पीएम व 2 विधायक प्रदेश सरकार में मंत्री हो, उस वाराणसी जिले में बिजली की भयावह स्थिति देखने को मिली। बिजली विभाग से सम्बंधित अधिकारी के ऊपर इन मंत्रियों का भी कोई प्रभाव न होने से वो लोग अपने मोबाइल तक को स्विच ऑफ कर इन मंत्रियों को इनकी औकात बता रहे हैं। प्रशासनिक तैयारियां धरी रही गयी और विद्युत आपूर्ति के सुचारू ढंग से चलाने की इनकी कवायद मात्र एक दिखावा भर ही रह गयी। जिलाधिकारी भी बस इस उपकेंद्र से उस उपकेंद्र तक दौड़ लगाते दिखे, इनकी कोई भी पहल सार्थक होती नहीं दिखी। शहरवासियों का कहना है कि जब पीएम मोदी संसदीय क्षेत्र की यह हालत है तो अन्य शहरों का अंदाजा लगाया जा सकता है। सवाल यही उठता है कि जब मंत्रियों को ये बात पता थी कि बिजली की समस्या उत्पन्न होने वाली है तो फिर क्यों नही इस समस्या के निराकरण के लिए पूर्व में उचित व्यवस्था क्यों नही की गई? क्या वाराणसी जिले के इन राजनेताओं का यहां की जनता के हितों से कोई सरोकार नही? क्या यहां की जनता सिर्फ वोट वाली फसल है जिसे चुनाव के समय काट लिया जाता है और चुनाव बाद उन्हें छुुट्ठा छोड़ दिया जाता है? लानत है ऐसे राजनेताओं और प्रशासनिक अमले पर जो अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में पूरी तरह से फेल हैं। अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल सारनाथ तथा आसपास सोमवार के दोपहर 2 बजे से आर्पूति ठप है इस सन्दर्भ में आज सुबह 9 बजे जब सारनाथ स्थित शक्तिपीठ स्थित पावरहाउस स्टेशन पर फोन कर स्थिति जाननी चाही तो सीधे यह जबाब मिला कि पावर हाउस को बन्द कर दिया गया।


वहीं दूसरी ओर हड़ताली कर्मचारियों का कहना था कि सरकार ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए बिजली विभाग को निजी हाथों में जो सौंपने का फैसला किया है, जो सही नहीं है. सरकार और समिति के बीच पिछले 5 अप्रैल 2018 को हुए समझौते का पालन किया जाए।
दरअसल, 5 अप्रैल 2018 को राज्य सरकार और बिजली विभाग के कर्मचारियों के संगठनों के बीच ऊर्जा प्रबंधन के साथ एक समझौता किया गया था। जिसमें कहा गया था कि निजीकरण से संबंधित कोई भी निर्णय लेने से पहले सरकार कर्मचारियों को विश्वास में लेगी और बिना विश्वास में लिए कोई भी फैसला नहीं करेगी लेकिन सरकार का अपना यह तरीका बन चुका है कि किसी के भी अपने नजरियां से हित को देखती है और कानून या अन्य निर्णय लेती है। उसे इस बात की जरूरत भी नहीं महसूस होती है कि जिनके लिए वो निर्णय या कानून बनाने की बात कर रही है उनसे भी विचारविर्मश कर लिया जाए, जिसका जीता जागता नमूना विद्युत विभाग व देश के किसान हंै। आज सरकार के कुछ नुुमाइंदे बैठ कर देश के लोंगो के भाग्य का निर्धारण करने में लगे हैं जिससे जनता का कितना भला हो रहा है उससे उनको कुछ नहीं लेना देना है। यह निश्चय की सरकार के दावें की पोल खोलता है।

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