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शारदीय नवरात्रि आज से प्रारम्भ, अष्टमी-नवमी एक ही दिन

 

DURGA
पंडित प्रसाद दीक्षित
धर्म, कर्मकांड एवं ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञ
-इस बार माॅ दुर्गा नावॅ पर आयेंगी व हाथी पर जायेंगी
-पंचांग 10 से 18 अक्टूबर तक
वाराणसी। इस बार शरदीय नवरात्रि का प्रारम्भ आज 10 अक्टूबर बुधवार आश्विन शुक्ल की प्रतिपदा से हो रहा है। शारदीय नवरात्रि में शक्ति की उपासना का विधान है । कई वर्षों बाद ऐसा संयोग बना है जब आश्विन मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि में ही देवी दुर्गा जी के निमित्त अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना होगा। 9 अक्टूबर 2018 को प्रतिपदा तिथि दिन में 9.10 पर लग जाएगी जो 10 अक्टूबर 2018 को प्रातः 7.56 रहेगी। इस बार देवी का आगमन नौका अर्थात नाव पर हो रहा है अर्थात यह सर्वोत्तम रहेगा। इसके प्रभाव से यदि बुधवार का दिन हो तो व्यापार में वृद्धि का योग रहेगा। बुधवार के दिन देवी का नौका का पर आगमन होना देश हित में रहेगा और इससे धन इत्यादि में बढ़ोतरी का योग रहेगा।

इस उपासना में वर्ण जाति का कोई बंधन नहीं है। अतः सभी वर्ण एवं जाति के लोग अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं। देवी की उपासना व्यापक है। दुर्गा जी के भक्त प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रखते हैं कुछ लोग अन्न त्याग देते हैं। कुछ श्री दुर्गा सप्तशती का सकाम या निष्काम भाव से पाठ करते हैं। संयत रहकर पाठ करना आवश्यक है, अतः यम- नियम का पालन करते हुए भगवती दुर्गा का आराधना या पाठ करना चाहिए। नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करने वाले जितने नियमित अंतर शुद्ध रहेंगे उतना ही मात्रा में उन्हें सफलता मिलेगी। प्रतिपदा से नवरात्र प्रारंभ होता है। आंगन में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जो और गेहूं बोए फिर उनके ऊपर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाए गए सोने, तांबे आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चांदी, तांबा, मृतिका, पाषाण अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति अधिक कच्ची मिट्टी का सिंदूर आदि से बनी हो और स्नान आदि से उसमें विकृति होने की आशंका हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति ना हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक एवं बनाकर दुर्गा जी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर विष्णु का पूजन करें। पूजन तामस नहीं होना चाहिए। नवरात्र के आरंभ में स्वस्तिवाचन शांति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह एवं वरुण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। अपने इष्टदेव, राम, कृष्ण, लक्ष्मी नारायण या भगवती दुर्गा देवी आदि की मूर्ति ही प्रधान मूर्ति कही जाती है।
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पूजन विधि, संप्रदाय निर्दिष्ट विधि से होना चाहिए। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कंडेय पुराण अंतर्गत श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ अनुष्ठान है।शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना का सर्वोत्तम मुहूर्त-
कलश स्थापना में चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग निषेध माना गया है। इस वर्ष चित्रा नक्षत्र आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को दिन में 12.36 तक तथा वैधृति योग दिन में 2.28 तक है। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का प्रभाव अभिजीत मुहूर्त पर नहीं पड़ता है। अभिजीत मुहूर्त दिन में 11.37 से दिन में 12.23 तक रहेगा। इस काल में ही नवरात्र में देवी दुर्गा के निमित्त कलश स्थापना करना सर्वोत्तम रहेगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि कई वर्षों बाद ऐसा संयोग बना है जब आश्विन मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि में ही देवी दुर्गा जी के निमित्त अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना होगा। 9 अक्टूबर 2018 को प्रतिपदा तिथि दिन में 9.10 पर लग जाएगी जो 10 अक्टूबर 2018 को प्रातः 7.56 रहेगी।
चूकी देवी का आगमन नौका अर्थात नाव पर हो रहा है अर्थात यह सर्वोत्तम रहेगा। इसके प्रभाव से यदि बुधवार का दिन हो तो व्यापार में वृद्धि का योग रहेगा। बुधवार के दिन देवी का नौका का पर आगमन होना देश हित में रहेगा और इससे धन इत्यादि में बढ़ोतरी का योग रहेगा।
अष्टमी युक्त नवमी का महत्व अति शुभ माना गया है। इस मुहूर्त में जो भी पूजा किया जाता है उसमें अक्षय लाभ की प्राप्ति होती है। आश्विन शुक्ल पक्ष 15 दिनों का है। 10 अक्टूबर 2018 से शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ होगा स आज ही चित्रा नक्षत्र वैधृति योग में कलश स्थापना का निषेध होने से अभिजीत मुहूर्त दिन में 11.37 से दिन में 12.23 तक कलश स्थापना का कार्य होगा।
विशेष- प्रतिपदा का मान प्रातः 7.56 मिनट तक है, अतः कलश स्थापना हेतु प्रतिपदा का उल्लंघन भी हो तो भी द्वितीया तिथि तथा अभिजीत मुहूर्त में देवी दुर्गा जी के निमित्त कलश स्थापना करें । दुर्गा वाहन नौका है। प्रतिपदा में देवी को पवित्र हेतु चंदन लेप अर्पण करें।
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पंचांग:-
11 अक्टूबर में द्वितीया तिथि में केश हेतु रेशमी पट्ट प्रदान करें।
12 अक्टूबर तृतीया में दर्पण तथा चरण हेतु सिंदूर अर्पण करें।
13 अक्टूबर चतुर्थी में देवी को दही, घी, मधु का मिश्रण तिलक हेतु, चांदी नेत्र हेतु अंजन का अर्पण करें।
14 अक्टूबर पंचमी में शक्ति अनुसार आभूषण अर्पण करें स 15 अक्टूबर प्रातः काल बेल वृक्ष को निमंत्रण तथा सांय ना षष्ठी तिथि ना होने पर साए सस्ती सप्तमी युग्मवाक्यअनुसार बेल वृक्ष को साक्षात दुर्गा मानकर देवी को शयन से जगाने हेतु मंत्रों का बोधन करें। दिन में मूल में प्रथम भाग में सरस्वती का आवाहन करें।
16 अक्टूबर सप्तमी तिथि दिन में 10.31 को समाप्त है। उसके बाद अष्टमी तिथि लग जाएगी। अतः निशित व्यापीनी अष्टमी में महानिशा पूजा तथा उससे संबंधित बलिदान आदि संपन्न होंगे। जिनमें पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के प्रथम चरण में सरस्वती पूजा होगी।
17 अक्टूबर अष्टमी व्रत होगा। आज देवी पूजन करें। कुमारी तथा ब्राह्मणों का पूजन करें। जिनमें 12.27 से मध्यान्ह में महा नवमी में हवन कथा संपन्न होगा।
18 अक्टूबर नवरात्र व्रत का पारण होगा तथा विजयादशमी होगी।
PLOT
नवरात्रि में तिथि विशेष इस प्रकार है –
बुधवार- प्रतिपदा तिथि प्रातः 7.56 तक
गुरुवार- द्वितीया तिथि प्रातः 7.08 तक
शुक्रवार- तृतीया तिथि प्रातः 6.49 तक
शनिवार- चतुर्थी तिथि प्रातः 6.59 तक
रविवार- पंचमी तिथि प्रातः 7रू. तक
सोमवार- षष्ठी तिथि दिन में 8.54 तक
मंगलवार- सप्तमी तिथि दिन में 10.31 तक
बुधवार- अष्टमी तिथि दिन में 12.27 तक तदुपरांत नवमी तिथि लग जाएगी ( दुर्गा अष्टमी एवं नवमी का आज ही महत्व है)
गुरुवार- नवमी तिथि दिन में 2.32 तक तदुपरांत दशमी तिथि लग जाएगी ( विजयादशमी का आज ही महत्व है )
पूजन का मुहूर्त- प्रतिपदा तिथि प्राप्त 7.56 तक की है। सबसे उत्तम मुहूर्त यही है कि अभिजित मुहूर्त दिन में 11.37 से 12.30 तक है। इस काल में कलश स्थापना करें।

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