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सही रणनीति व सटीक लक्ष्य से ही सफलता संभव: डाॅ निधि पटेल

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विजय श्रीवास्तव
-आईएसएस की परीक्षा में 364 वां रैंक हासिल किया है डाॅ निधि पटेल
-हेल्थ सिस्टम में बदलाव के लिए आगे आने की जरूरत
-परीक्षा में क्या पढना है, कितना पढना है यह भी महत्वपूर्ण
-इंटरनेट की दुनिया में आज गुगल पर सभी समाग्री उपलब्ध
वाराणसी। सही रणनीति, सटीक लक्ष्य और कुछ कर गुजरने का जुनुन अगर हो तो हर लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। कुछ ऐसा ही देश की सबसे बडी परीक्षा आईएसएस में 364 रैंक हासिल करने वाली इलाहाबाद की डाॅ निधि पटेल  में देखने को मिला। एम.बी.बी.एस व एम.एस की डिग्री के बाद दिल्ली में सीनियर रेसीडेन्ट आफिसर के पद पर आसीन होने के बाद भी सिस्टम में बदलाव के जुनून ने उन्हें आज देश की सर्वोच्च परीक्षा आई.एस.एस पास कर उन्हें सफलता के मुकाम पर खडा कर दिया जहां से देश व समाज को एक सकारात्मक दिशा दिया जा सकता है।

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डाॅ निधि पटेल का मानना है कि आईएएस के लिए कोचिंग  कोई जरूरी नहीं है। क्या पढना है, कितना पढना है, कहां से पढना है, यह महत्वपूर्ण होता है। हर चीज को बारीकी से देखने व समझने की जरूरत है। दैनिक समाचार पत्र के साथ हिन्दू अंग्रेजी पत्र का अध्ययन तैयारी में काफी सार्थक भूमिका निभाता है। 8-9 माह की तैयारी में ही पहले ही प्रयास में आईएएस की परीक्षा क्वालिफाई करने वाली डाॅ निधि पटेल का मानना है कि इटंरव्यू को हौवा नहीं समझना चाहिए। अपने हावी के बारें में भी सटीक व विस्तृत जानकारी रखनी चाहिए। उक्त बातें आज आस्था व तपस्या की तपोभूमि सारनाथ में स्थित धर्मचक्र इण्टर कालेज में अपने सम्मान समारोह में छात्रों से बातचीत के दौरान कहीं। इस दौरान कालेज के प्रबन्धक संजय कुमार सहित स्कूल के अन्य अध्यापकों ने डाॅ निधि पटेल का स्वागत किया।

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स्ंगम नगरी इलाहाबाद से अपनी शिक्षा की शुरूआत करने वाली डाॅ निधि पटेल ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एमएमबीएस व एमएस की परीक्षा उत्र्तीण की। इसके बाद दिल्ली में असिसडेंट मेडिकल आफिसर के रूप में अपने सफर की शुरूआत की लेकिन चन्द दिनों में उन्हें जैसे यह लगने लगा कि उनकी सीमा रेखा केवल अस्पताल तक ही सीमित है और उसमें भी वो बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं है। उन्हें लगने लगा कि सिस्टम में कुछ बदलाव लाना होगा जो कि इस पद पर रह कर नहीं किया जा सकता है। उन्होंने जून वर्ष 2016 में अपने पति डाॅ करन सिंह व अपने पिता राम मूर्ति पटेल के प्रोत्साहन व पे्ररणा से आईएसएस की परीक्षा में बैठने की निर्णय लिया। उन्होंने बताया कि उसके बाद मैंने नौकरी छोड दी और परीक्षा की तैयारी में जुट गयी। चार माह कोचिंग करने के बाद उन्होंने उसे भी छोड दिया। उन्हें लगने लगा कि स्वंय ही अध्ययन करना अधिक कारगर होगा और इन्टरनेट की दुनिया में आज कहीं भटकने की जरूरत ही नहीं है। बस यह जानकारी होनी चाहिए कि क्या सलेबस है, क्या पढना है और कितना पढना है। उन्होंने कहा कि मेरा तो एनराल्ड मोबाइल ही सब कुछ था, उसी से हर समय में अपनी पढाई करती रहती थी। कक्षा 6 से 12 तक की पढाई भी अगर सही ढंग से किया जाए तो उससे काफी मदद मिलती है। इस सर्वोच्च परीक्षा में उर्तीण लोंगो के ब्लाग पढ कर भी काफी प्रेरणा व जानकारी मिलती है। लगन व मेहनत से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

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वेब पोर्टल 24टाइम्सटूडे के न्यूज एडिटर विजय श्रीवास्तव से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि सिविल सेवा में मेडिकल लाइन से भी लोंगो को जाना चाहिए। जिससे वह प्रशानिक सेवा में स्वास्थ्य की दिशा में बेहतर कार्य कर सके। उनका कहना है कि अभी हमारें देश में स्वास्थ्य की दिशा में बहुत काम होना बाकी है। गरीबी के चलते लोग अपना इलाज नहीं करा पाते हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य व शिक्षा के प्रति जागरूकता की आज देश में सबसे अधिक आवश्यकता है। उनका मानना है कि जाति-पाति से आज हमें उबरना होगा, तभी देश का विकास संभव हो सकेगा।

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