चंदौली समाचार: मनरेगा में लूट की असली समस्या

चंदौली जिले में मनरेगा में लूट के लिए भले ही पंचायत प्रतिनिधियों और ग्राम प्रधानों को दोषी ठहराया जाता हो, लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी काम शुरू करने के पहले लिया जाने वाला एडवांस कमीशन और पेमेंट के दौरान दिया जाने वाला कमीशन ही इसकी प्रमुख समस्या है। मजदूर नेता अजय राय ने कहा कि मजदूरों को रोजगार की गारंटी देने वाली योजना अब अधिकारियों को कमीशन देने की गारंटी वाली स्कीम बन चुकी है।

गांवों में बिना काम के भुगतान की आदत

पहले यह आदत गांव में बिना काम कराए लाखों के भुगतान कराने के लिए डाली गई थी, जिसे अब अधिकारियों और मनरेगा से जुड़े कमीशनखोरों ने सबके लिए आम कर दिया है। इसका खामियाजा उन प्रधानों को भुगतना पड़ता है जो पहले पैसा नहीं दे सकते या आर्थिक रूप से काफी कमजोर हैं।

मनरेगा की शुरूआत और उद्देश्य

मनरेगा योजना गांवों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कांग्रेस के शासन में लाई गई थी। यह मजदूरों के लिए काम की मांग आधारित कानून था। इसलिए उनकी जॉब कार्ड भी बनाए गए थे, जिसमें काम के दिन अंकित करना जरूरी था और हर हाल में पंद्रह दिन में मजदूरी भुगतान करना था।

जॉब कार्ड में कमी

धीरे-धीरे जॉब कार्ड कम कर दी गई। मनरेगा कानून के तहत रोजगार उपलब्ध कराने की महत्ता तब समझ में आई जब शहरों से मजदूर कोरोना काल में पलायन कर रहे थे। तब इसी मनरेगा ने गांवों में काम देकर रोजगार उपलब्ध कराया।

वर्तमान स्थिति और सरकार की भूमिका

मोदी जी इस योजना की अहमियत को लगातार नकारते रहे हैं, उसी का परिणाम है कि मनरेगा के केंद्रीय बजट को लगातार कम किया जा रहा है। इस लेख में हमने चंदौली जिले में मनरेगा में लूट की समस्या, बिना काम के भुगतान की आदत, मनरेगा की शुरूआत और उद्देश्य, जॉब कार्ड में कमी, और वर्तमान स्थिति पर सरकार की भूमिका पर चर्चा की है। मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराना था, लेकिन भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी ने इस योजना को कमजोर कर दिया है।

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