Property Dispute: प्रॉपर्टी विवाद में पति की संपत्ति पत्नी को मिलता है इतना हक, कोर्ट ने दिया फैसला

Property Dispute: प्रॉपर्टी विवाद में पति की संपत्ति पत्नी को मिलता है इतना हक, कोर्ट ने दिया फैसला

Property Dispute: हाउसवाइफ़ का पति की संपत्ति पर इतना अधिकार होने के बारे में मद्रास हाई कोर्ट ने एक फैसला सुना है। यह कहा जाता है कि शादी के बाद लड़की को ससुराल में पति के बराबर हक होता है। आइए जानते हैं कोर्ट के फैसले के बारे में विस्तार से:

कोर्ट ने दिया फैसला

यह फैसला तमिलनाडु के एक दंपति से जुड़े मामले में दिया गया था। इस जोड़े की शादी 1965 में हुई थी और लेकिन 1982 के बाद पति को सऊदी अरब में नौकरी मिल गई और वहीं रहने लगे। तमिलनाडु में रह रही उनकी पत्नी ने पति की कमाई से वहां कई संपत्तियां खरीद लीं, जो पति के भेजे पैसे से ख़रीदी गई थीं। पत्नी की कोई कमाई नहीं थी।

अदालत के तर्क

मद्रास हाई कोर्ट ने पत्नी के घरेलू काम करके संपत्ति बनाने में उनका योगदान को मान्यता दी है। यहां ये फ़र्क नहीं पड़ता कि संपत्ति पत्नी के नाम ख़रीदी गई है या पति के नाम। जबकि पति या पत्नी ने परिवार की देखभाल की है, तो संपत्ति में बराबरी का हक़दार होता है।

अदालत ने कहा कि पत्नी के घरेलू काम की वजह से पति के पैसे में परोक्ष तौर पर बढ़ोतरी हुई होगी, जिससे संपत्ति खरीदने में मदद मिली होगी। अदालत ने कहा कि पति आठ घंटे की नौकरी करता है लेकिन पत्नी चौबीस घंटे काम करती है, जिससे पति को नौकरी करने में आसानी होती है। इससे पति को नौकरी करने के लिए कई चीज़ों के लिए पैसे खर्च करने पड़ते। जबकि गृहिणी घर में कई भूमिकाएं निभाती हैं और इससे पति को नौकरी करने में आसानी होती है।

अदालत ने कहा, “इन सभी कामों को करके पत्नी घर का माहौल आरामदेह बनाती हैं। इस तरह परिवार में उनका योगदान निश्चित तौर पर एक महत्वहीन काम नहीं है। ये बगैर किसी छुट्टी के 24 घंटे का काम है।

“इसकी तुलना पति के आठ घंटे की ड्यूटी से नहीं की जा सकती है।” इसलिए अदालत ने तमिलनाडु के दंपति के लिए यह फैसला दिया कि पत्नी को ससुराल में पति के समान हक होता है और उन्हें संपत्ति के अधिकार की प्राप्ति का अधिकार है।

यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को समझने में एक महत्वपूर्ण कदम है। अक्सर समाज में, स्त्री अपने ससुराल में अपने स्वयं के समान अधिकार रखने के लिए लड़ाई करनी पड़ती है। इस फैसले से यह संदेश मिलता है कि सम्पत्ति के मामले में महिला को भी समान अधिकार होता है और उन्हें समाज में सम्मान देना चाहिए।

समाज में लिंग भेदभाव को कम करने के लिए इस तरह के न्यायिक फैसले महत्वपूर्ण हैं। यह सुनिश्चित करता है कि समाज के सभी सदस्यों को समान अधिकार मिलते हैं, चाहे वे पुरुष हों या महिला। महिलाओं को सम्पत्ति के मामले में भी उनके हक़ को समझने और मान्यता देने की आवश्यकता है, जो उन्हें उनके स्वतंत्र और सम्मानित इंसान के रूप में अभिव्यक्ति करता है।

यह फैसला भारतीय समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी है, जो महिलाओं को उनके अधिकारों को जानने और उन्हें हक़ युक्ति से प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है। समाज में इस तरह के सकारात्मक बदलावों के लिए न्यायिक अधिकारियों के निर्णयों का सम्मान करना और उन्हें लागू करना आवश्यक है ताकि समाज एक और समरस्थ रूप से आगे बढ़ सके।

इस फैसले से यह संदेश भी मिलता है कि समाज में स्त्रियों के योगदान को महत्व देना और उन्हें सम्मानित बनाना जरूरी है। अपने पारिवारिक और समाजिक रोल्स के साथ, वे समाज के संचालन में भी अहम योगदान प्रदान करती हैं।

अब, इस फैसले के प्रति लोगों के रुख का दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई और अध्ययन करने के लिए एक सामान्य चर्चा और विचार की जरूरत है। इससे न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों के सम्मान में सुधार होगा, बल्कि यह समाज को एक अधिक समरस्थ और समानतापूर्ण संस्थान बनाने में भी मदद मिलेगी।

कर्मचारी के यथार्थ समय सीमा का पालन करने से संबंधित मामले में, न्यायिक प्रक्रिया में सुधार करने की जरूरत है ताकि अधिकारों की रक्षा और सुनिश्चितता हो सके। यह सभी के लिए न्याययुक्त और समान समय सीमा को पालन करने का एक बड़ा कदम होगा।

समाप्ति के रूप में, यह निर्णय एक सकारात्मक चेतावनी है कि समाज में समानता और न्याय को बढ़ावा देने के लिए न्यायिक प्रक्रिया को सुधारा जा सकता है। यह उस समय की भावना को प्रतिबिंबित करता है, जब हम सभी में समानता, समरसता, और सभी के अधिकारों की रक्षा को लेकर एक मिलजुल कर रहे होते हैं।

By Vijay Srivastava

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *