Sedition vs Treason : राजद्रोह और देशद्रोह के बीच का अंतर समझें, आजादी के संवाद पर प्रतिबंध नहीं!

Sedition vs Treason : राजद्रोह और देशद्रोह के बीच का अंतर समझें, आजादी के संवाद पर प्रतिबंध नहीं!

भारतीय कानून में राजद्रोह और देशद्रोह: एक नजर में

परिचय

Sedition vs Treason : राजद्रोह और देशद्रोह, ये दो शब्द भारतीय कानून में गंभीर अपराधों की परिभाषा हैं। इनके तहत किए गए अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है, जो देश की सुरक्षा और एकता को खतरे में डाल सकते हैं। इस लेख में, हम राजद्रोह और देशद्रोह के बारे में विस्तार से जानेंगे और इनके परिणाम समझने की कोशिश करेंगे।

राजद्रोह: परिभाषा और सजा

भारतीय संविधान में आईपीसी की धारा 124 ए में राजद्रोह को परिभाषित किया गया है। यदि कोई व्यक्ति गवर्नमेंट विरोधी बातें लिखता है या बोलता है, या फिर ऐसी ही बातों का समर्थन करना है, या राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करता है या फिर संविधान को नीचा दिखता है तो उस व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 124 A के तहत राजद्रोह का केस दर्ज किया जा सकता है। इसके अंतर्गत, अगर कोई व्यक्ति राजद्रोह के अपराध में पाया जाता है, तो उसे सजा का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि सजा का प्रावधान इसमें कम है, लेकिन यह आवश्यक है कि इस प्रकार के अपराधों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं ताकि देश की सुरक्षा को किसी भी प्रकार के खतरे से बचाया जा सके।

देशद्रोह: गंभीर अपराध

देशद्रोह को आईपीसी की धारा 121 के तहत माना जाता है और इसका मतलब होता है कि यदि कोई व्यक्ति देश के खिलाफ अपराध करता है, तो उसे गंभीर सजा का सामना करना पड़ सकता है।देश में सरकार को क़ानूनी रूप से चुनौती देना देशद्रोह की श्रेणी में आता है। वैसे आपको बता दें कि सरकार का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाना या इसके अलावा उसमें बदलाव के लिए मांग किया जाना देश के हर नागरिक का अधिकार होता है। लेकिन गैरकानूनी तरीके से सरकार का विरोध देशद्रोह कहा जाता है।  इस अपराध में आजीवन कारावास या फिर फांसी की सजा भी हो सकती है। यह देश की सुरक्षा और एकता के खिलाफ एक माज़बूत कदम है जो सुनिश्चित करता है कि विचारों की आजादी का गलत उपयोग नहीं होता।

सजा का प्रावधान

राजद्रोह और देशद्रोह, दोनों ही अपराध गंभीर होते हैं और इनके खिलाफ सजा का प्रावधान किया गया है। यदि कोई व्यक्ति इन अपराधों में पाया जाता है, तो उसे निष्कस्त किया जा सकता है और उसे जीवन की सजा या फिर मौत की सजा हो सकती है। यह सजा का प्रावधान उन लोगों को डराने में मदद करता है जिन्होंने देश की सुरक्षा के खिलाफ अपनी शानदारी की है।

विपक्षी दलों के आरोप

राजद्रोह और देशद्रोह के मुद्दे पर विपक्षी दल समेत नागरिक संगठन भी आवाज उठाते हैं। उनका कहना है कि सरकारें राजद्रोह और देशद्रोह के रूप में आवाज़ को दबाने की कोशिश करती हैं, जिससे कि विरोधी या विचारशील स्वतंत्रता की आवाज दबी रहे। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर बिल के माध्यम से सभी संशयों को समाप्त करने का प्रयास किया है, जो बड़ी महत्वपूर्ण घटना है।

नई परिभाषा

भारतीय संविधान के तहत, राजद्रोह को धारा 124 ए में परिभाषित किया गया है। इसकी सजा सामान्यत: सजा होती है। जब कोई राजद्रोह के मामले में दोषी पाया जाता है, तो उसे सरकारी नौकरी और पासपोर्ट की आवेदन पर रोक लग सकती है। इससे साफ तौर पर यह साबित होता है कि सरकार सख्ती से राजद्रोह के खिलाफ खड़ी है।

देशद्रोह: विरासत में महत्वपूर्ण कदम

धारा 121

देशद्रोह के मामले में, आईपीसी की धारा 121 लागू होती है। इसके अनुसार, दोषी को आजीवन कारावास या फिर फांसी की सजा दी जा सकती है। यह सरकार की ओर से देशद्रोह के प्रति गंभीर दृष्टिकोण को प्रकट करता है, जो एक स्वतंत्रता समृद्धि के माध्यम के रूप में स्वीकारा जाता है।

महत्वपूर्ण घटनाएँ और मुद्दे

प्रमुख केस: महान व्यक्तित्वों की विरोधी आवाज

भारत में राजद्रोह के कई महत्वपूर्ण मामले दर्ज किए गए हैं। पहला केस महारानी बनाम जोगेंद्र चंद्र बोस के खिलाफ था, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुनवाई की थी। इसके बाद, बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ भी राजद्रोह के मामले में केस दर्ज किया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि राजद्रोह का मुद्दा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी महत्वपूर्ण था।1947 में देश की आजादी के बाद से अब तक राजद्रोह के 76 केस दर्ज किए गए हैं. 

स्वतंत्रता के बाद

आजादी के बाद भारत में राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए, जिनमें बृज भूषण और दिल्ली राज्य के बीच (1950) तथा रोमेश थापर और मद्रास राज्य के बीच (1950) के केस शामिल थे। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि एक ऐसा कानून जो सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने का खतरा पैदा करता है, असंवैधानिक है। यह निर्णय ने नागरिकों के मौजूदा और आने वाले स्वतंत्रता में सुरक्षा और स्वतंत्रता की महत्वपूर्णता को प्रमोट किया।

नए दिशानिर्देश : स्वतंत्रता की सच्ची आवाज

आजकल, राजद्रोह और देशद्रोह के मुद्दे और मामलों में नए दिशानिर्देश देखने को मिल रहे हैं। यह साफ दिखता है कि भारत स्वतंत्रता, सद्गति और विकास की दिशा में अग्रसर हो रहा है। यह उम्मीद है कि समाज सामाजिक और राजनीतिक अवस्थाओं में सुधार के माध्यम से एक नए और उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ेगा। ये बिल इसलिए ऐतिहासिक हैं क्योंकि पहली बार राजद्रोह, देशद्रोह और आतंकवाद को स्पष्ट तरीके से परिभाषित किया गया है बिल को पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि राजद्रोह और आतंकवाद को लेकर तस्वीर को मौजूदा सरकार पूरी तरह साफ कर रही है. ये विधेयक अब मौजूदा आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट की जगह लेंगे और संसदीय कमेटी की इसकी जांच करेगी.

इस लेख में हमने राजद्रोह और देशद्रोह के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को समझाने का प्रयास किया है। यह स्पष्ट है कि इन दोनों मुद्दों के बीच का अंतर न केवल कानूनी है, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय समाज को इन मुद्दों के प्रति जागरूक रहना आवश्यक है ताकि हम सभी मिलकर सुरक्षित, मुक्त और समृद्धि भरे भविष्य की दिशा में अग्रसर हो सकें।

By Vijay Srivastava